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चरकसंहिता सूत्रस्थान
आयुर्वेद प्रश्नावली- चरकसंहिता सूत्रस्थान से सम्बन्धित १००० प्रश्नोत्तर
Set 3: (351 to 700)
(351) मन को ‘अतीन्द्रिय’ की संज्ञा किस आचार्य ने दीहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग)वाग्भट्ट (घ) तर्क संग्रह
(352) चेष्टाप्रत्ययभूतं इन्द्रियाणाम्। - किसका कर्म है।
(क) वायु का (ख) मन का (ग) आत्मा का (घ) मस्तिष्क का
(353) ‘चक्षु’है।
(क) इन्द्रिय (ख) इन्द्रियार्थ (ग) इन्द्रियाधिष्ठान (घ) इन्द्रिय द्रव्य
(354) ‘अक्षि’है।
(क) इन्द्रिय (ख) इन्द्रियार्थ (ग) इन्द्रियाधिष्ठान (घ) इन्द्रिय द्रव्य
(355) क्षणिका और निश्चयात्मिका - किसके भेद है।
(क) पंचेन्द्रिय बुद्धि (ख) पंचेन्द्रियार्थ (ग) पंचेन्द्रिय द्रव्य (घ) पंचेन्द्रिय
(356) ‘इन्द्रिय पंचपंचक’ का वर्णन किस आचार्य ने कियाहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग)वाग्भट्ट (घ) उपरोक्तसभी
(357) चरक के मत से ‘अध्यात्म द्रव्यगुणसंग्रह’ है।
(क) मन, मर्नोऽर्थ,बुद्धिआत्मा (ख) मन, मर्नोऽर्थ, बुद्धि (ग) मन, मर्नोऽर्थ, (घ)मन
(358) मन का अर्थ है।
(क) चिन्त्य (ख) विचार्य (ग) ऊह्य (घ) उपरोक्त सभी
(359) मन का अर्थ है।
(क) चिन्त्य (ख) विचार्य (ग) ऊह्य (घ) संकल्प
(360) चरक संहिता के किस अघ्याय में ‘सदवृत्त’का वर्णन मिलता है।
(क) मात्राशितीय (ख) तस्याशितीय (ग) इन्द्रियोपक्रमणीय (घ) न वेगान्धारणीय
(361) चरकानुसार मनुष्य को 1 पक्ष में कितने बार केश, श्मश्रु, लोम व नखकाटना चाहिए।
(क) 1 (ख) 2 (ग) 3 (घ) 4
(362) चरकानुसार किस दिशा में मुख करके भोजन करना चाहिए।
(क) पूर्व (ख) उत्तर (ग) पश्चिम (घ) दक्षिण
(363) इन्द्रियों को अंहकारिककिसने माना है।
(क) वैशेषिक (ख) न्याय (ग) सांख्य (घ) चरक
(364) चरक के मत से ‘अर्थद्वय’ का अर्थ है
(क) धर्म, अर्थ (ख) आरोग्य एवं इन्द्रियविजय (ग)काम, मोक्ष (घ) कोई नहीं
(365) ‘विकारोधातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरूच्यते’ - किस आचार्य का कथनहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग)वाग्भट्ट (घ) भावप्रकाश
(366) ‘रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता’ - किस आचार्य का कथनहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग)वाग्भट्ट (घ) भावप्रकाश
(367) ’निर्देशकारित्वम्‘ किसका गुण है।
(क) वैद्य (ख) औषध (ग) परिचारक (घ) आतुर
(368) ’श्रृते पर्यवदातत्वं‘ किसका गुण है।
(क) वैद्य (ख) औषध (ग) परिचारक (घ) आतुर
(369) ’दाक्ष्य्‘ किसका गुण है।
(क) वैद्य (ख) परिचारक (ग) आतुर (घ) वैद्य,परिचारक दोनों
(370) ’उपचारज्ञता‘ किसका गुण है।
(क) वैद्य (ख) औषध (ग) परिचारक (घ) आतुर
(371) चरकानुसार चिकित्सा के चतुष्पाद में वैद्य के प्रधान होने का कारण है।
(क) दाक्ष्य, शौच (ख) मेधावी, युक्तिज (ग) हेतुज्ञ, युक्तिज (घ) विज्ञाता, शासिता
(372) प्राणाभिसर वैद्य के गुण है ?
(क) 4 (ख) 6 (ग) 10 (घ) 12
(373) राजार्ह वैद्य के ज्ञान है ?
(क) 4 (ख) 6 (ग) 10 (घ) 12
(374) चरकानुसार वैद्य के गुण है ?
(क) 4 (ख) 6 (ग) 10 (घ) 12
(375) राजार्ह वैद्य के ज्ञान है ?
(क) तस्मात् शास्त्रऽर्थ विज्ञाने प्रवृतौ कर्मदर्शने। (ख) योगमासां तु यो विद्यात् देशकालोपपादितम्। (ग) विद्या वितर्की विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया। (घ) हेतो लिंगे प्रशमने रोगाणाम् अपुनर्भवे।
(376) वैद्य की 4 वृत्तियों मे शामिल नहींहै।
(क) मैत्री (ख) कारूण्य (ग) मुदिता (घ) उपेक्षा
(377) प्रकृति स्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिः चतुर्विधा। - यहॉ पर प्रकृति स्थेषु का क्या अर्थ है।
(क) स्वास्थ्य (ख) मृत्यु (ग)चिकित्सा (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(378) निम्नलिखित में कौनसा वर्ग गुण या दोष उत्पन्न करने के लिए पात्र की अपेक्षा करता हैं।
(क) शस्त्र, शास्त्र, वैद्य (ख) शस्त्र, शास्त्र, सलिल (ग) शस्त्र, शास्त्र, द्रव्य (घ) शस्त्र, शास्त्र, रोगी
(379) चरकानुसार ‘साध्य’ के भेद है ?
(क) द्विविध (ख) त्रिविध (ग) चतुर्विध (घ) अ, ब दोनो
(380) न च तुल्य गुणों दूष्यो न दोषः प्रकृति भवेत्- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) अनुपक्रम रोग
(381) कालप्रकृति दूष्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(382) मर्मसन्धिसमाश्रितम- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(383) नातिपूर्ण चतुष्पदम् - किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(384) गम्भीरं बहु धातुस्थं- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(385) क्रियापथम् अतिक्रान्तं- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ)प्रत्याख्येय रोग
(386)रोगं दीर्घकालम् अवस्थितम्- किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(387) विद्यात् द्विदोषजम् - किसका लक्षण है।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(388) .....द्विदोषजम्।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय रोग
(389) ज्वरे तुल्यतुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता। रक्तगुल्मे पुराणत्वं .....स्य लक्षणं।
(क) सुखसाध्य (ख) कृच्छ्रसाध्य (ग) याप्य (घ) अनुनक्रम
(390) ज्वरे तुल्यतुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदोषता। रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्।- किसका कथन है ?
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग)वाग्भट्ट (घ) भावप्रकाश
(390) रिक्तस्थानकी पूर्ति कीजिए - प्रमेहे .....सुखसाध्यस्य लक्षणम्।
(क) तुल्यतुदोषत्वं (ख) तुल्यदोषता (ग) तुल्यऋतुः (घ) पुराणत्वम्
(391) चरकानुसार ‘तिस्त्र एषणा’ है।
(क) धर्म, अर्थ, मोक्ष (ख) धर्म, काम, मोक्ष (ग) प्राण, धन, परलोक (घ) प्राण, धन, धर्म
(392) चरकानुसार ‘प्रथम एषणा’ है।
(क) प्राणैषणा (ख) धनैषणा (ग)परलोकैषणा (घ) धर्मेषणा
(393) प्रत्यक्ष प्रमाण में बाधक कारण है।
(क) 4 (ख) 8 (ग) 6 (घ) 10
(394) प्रमाण के लिए 'परीक्षा'शब्द किसने प्रयोग किया है।
(क) वैशेषिक (ख) सुश्रुत (ग) जैन (घ) चरक
(395) चरकानुसार ‘अनुमान’ के भेद है ?
(क) द्विविध (ख) त्रिविध (ग) चतुर्विध (घ) पंचविध
(396) 'षड्धातु पंचमहाभूत तथा आत्मा के संयोग से गर्भ की उत्पत्ति होती है'- ये किस प्रमाण का उदाहरण हैं।
(क) प्रत्यक्ष (ख) अनुमान (ग) आप्तोपदेश (घ) युक्ति
(397) ’‘बुद्धि पश्यति या भावान् बहुकारणयोगजान।'- किसके लिए कहा गया है।
(क) प्रत्यक्ष प्रमाण हेतु (ख) अनुमान हेतु (ग) युक्ति हेतु (घ) उपमान हेतु
(398) त्रिवर्ग में शामिल नहीं है।
(क) धर्म (ख) अर्थ (ग) काम (घ) मोक्ष
(399) चरकानुसार निम्न में कौन सा प्रमाण पुनर्जन्म सिद्ध करता हैं -
(क) प्रत्यक्ष (ख) अनुमान (ग) आप्तोपदेश (घ) उपरोक्त सभी
(400) आचार्य चरक ने प्रत्यक्ष प्रमाणं से पुनर्जन्म सिद्धि में कितने उदाहरण दिये हैं।
(क) 11 (ख) 12 (ग) 13 (घ) 8
(401) त्रिउपस्तम्भ है।
(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) सत्व, आत्मा, शरीर (घ) हेतु,दोष, द्रव्य
(402) ‘आहार, स्वप्न तथा ब्रह्मचर्य’ - किस आचार्य के अनुसार त्रय उपस्तम्भ हैं।
(क) चरकानुसार (ख) अष्टांग संग्रहानुसार (ग) सुश्रुतानुसार (घ) अष्टांग हृदयानुसार
(403) वाग्भट्टानुसार त्रिउपस्तम्भ है।
(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, अब्रह्मचर्य (ग) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (घ) सत्व, आत्मा, शरीर
(404) त्रिस्तम्भ है।
(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) सत्व, आत्मा, इन्द्रिय (घ) हेतु, दोष, द्रव्य
(405) त्रिस्थूणहै।
(क) हेतु, लिंग, औषध (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) वात, पित्त, कफ (घ) सत्व,रज, तम
(406) त्रिविध विकल्पहै।
(क) अतियोग, अयोग, सम्यक्योग (ख) अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग (ग) अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग (घ) सम्यक्योग, हीनयोग, मिथ्यायोग
(407) चरकानुसार त्रिविध रोग है।
(क) वातज, पित्तज, कफज रोग (ख) कायिक, मानसिक, स्वाभाविकरोग (ग) शारीरिक, मानसिक,आगन्तुक रोग (घ) निज, आगन्तुज, मानसरोग
(408) किस इन्द्रिय की व्याप्ति सभी इन्द्रियों में है ?
(क) चक्षु (ख) घ्राण (ग) त्वक् (घ) रासना
(409) देहबल के भेद होतेहै।
(क) 2 (ख) 3 (ग) 5 (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(410) शाखा में होने वाली व्याधियॉ की संख्या कही गयी है।
(क) 14 (ख) 11 (ग)16 (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(411) त्रिविधं विकल्प वत्रिविधमेव कर्म है।
(क) कर्म (ख) काल (ग) प्रज्ञापराध (घ) प्रवृत्ति
(412) 'शोष, राजयक्ष्मा' कौनसे मार्गज व्याधियॉ हैं।
(क) बाहृय रोगमार्ग (ख) मध्यम रोगमार्ग (ग) आभ्यन्तर रोगमार्ग (घ) सर्वरोगमार्ग
(413) विद्रधि, अर्श, विसर्प ,शोथ, गुल्म व्याधियॉ है।
(क) शाखाआश्रित (ख) कोष्ठआश्रित (ग) अस्थिसंधि मर्माश्रित (घ) अ, ब दोनों
(414) पुनः अहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनोनिग्रहः - कौनसी औषध है।
(क) दैव व्यापाश्रय (ख) युक्ति व्यपाश्रय (ग) सत्वावजय (घ) शोधन
(415) पुनः आहार औषधद्रव्याणां योजना - कौनसी औषध है।
(क) दैवव्यापाश्रय (ख) युक्तिव्यापाश्रय (ग) सत्वावजय (घ) संशोधन
(416) 'पल्लवग्राही' वैद्य कौन होता है।
(क) प्राणभिसर (ख) रोगाभिसर (ग) शास्त्रविद (घ) छद्मर वैद्य
(417) प्रयोग ज्ञान विज्ञान सिद्धि सिद्धाः सुखप्रदाः। - किस वैद्य के गुण है।
(क) जीविताभिसर (ख) रोगाभिसर (ग) सिद्धसाधित (घ) छद्मर वैद्य
(418) तिस्त्रैषणीय अध्याय में कुल त्रित्व है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8
(419) अष्ट त्रित्व का वर्णन किस आचार्य ने किया है।
(क) पुनर्वसु आत्रेय (ख) मैत्रेय (ग) भिक्षु आत्रेय (घ) कृष्णात्रेय
(420) आचार्य कुश ने वात के कितने गुण बतायेगए है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8
(421) वात का गुण ‘दारूण’ किसने माना है।
(क) कुश (ख) वडिश (ग) वार्योविद (घ) भारद्वाज
(422) प्राकृत शरारस्थ वायु का कर्म नहीं है।
(क) तन्त्रयंत्रधर (ख) सर्वेन्द्रियाणामुद्योजक (ग) समीरणोडग्नेः (घ) सर्वशरीरव्यूहकर
(423) मन का नियंत्रण कौन करता है।
(क) मस्तिष्क (ख) मन (ग) वायु (घ) आत्मा
(424) वायुस्तन्त्रयन्त्रधर - में ‘तंत्र’ का क्या अर्थ है।
(क) मस्तिष्क (ख) शरीर (ग)शरीरवयव (घ) आत्मा
(425) आयुषोऽनुवृत्ति प्रत्ययभूतो- किसका कर्म है।
(क) वायु का (ख) मन का (ग) आत्मा का (घ) मस्तिष्क का
(426) वातकलाकलीय अध्याय में ‘पित्त संबंधी वर्णन’ किसने कियाहै।
(क) काप्य (ख) वडिश (ग) वार्योविद (घ) मरिच
(427) चरकानुसार ज्ञान-अज्ञान में कौनसा दोष उत्तरदायी होता है।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ) आम
(428) वायु एंव आत्मा दोनों का पर्याय है।
(क) विभु (ख) विश्वकर्मा (ग) विश्वरूपा (घ) उपर्युक्त सभी
(429) आचार्य चरक के मत से ‘प्रजापति’ किसका पर्याय है।
(क) वायु (ख) आत्मा (ग) शुक्र (घ) अन्न
(430) आचार्य काश्यप ने ‘प्रजापति’ की संज्ञा किसे दीहै।
(क) वायु (ख) आत्मा (ग) शुक्र (घ) अन्न
(431) आचार्य चरकने ’भगवान्’ की संज्ञा किसे दीहै।
(क) वायु (ख) काल (ग) आत्रेय (घ) अ, स दोनो
(432) आचार्य सुश्रुत ने ’भगवान्’ संज्ञा किसे दी है।
(क) वायु (ख) काल (ग) जठराग्नि (घ) उपर्युक्त सभी
(433) स्नेह की योनियॉ है।
(क) 2 (ख) 3 (ग) 4 (घ) 8
(434) स्नेह कितनेहोते है।
(क) 2 (ख) 3 (ग) 4 (घ) 8
(435) विरेचन हेतु उत्तम तैलहै।
(क) तिल तैल (ख) सर्षप तैल (ग) एरण्ड तैल (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(436) सभी स्नेहों में उत्तम है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(437) ’तैल का सेवन’ का निर्देश किस ऋतु में है।
(क) शरद (ख) प्रावृट (ग) माधव (घ) वर्षा
(438) ’मज्जा सेवन’ का निर्देश किस ऋतु में है।
(क) शरद (ख) प्रावृट (ग) माधव (घ) वर्षा
(439) ’कर्ण शूल’ में लाभप्रद है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(440) चरकानुसार ’शिरःरूजा’ में लाभप्रद है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(441) चरकानुसार ’निर्वापण’ किसका कार्य है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(442) चरकानुसार ’योनिविशोधन’ किसका कार्य है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(443) ’मज्जा’ का अनुपान है।
(क) यूष (ख) मण्ड (ग) पेया (घ) उष्णजल
(444) ’यूष’ किसका अनुपान है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(445) उष्ण काल में दिन में स्नेहपान करने कौन सा रोग हो सकता है।
(क) मूर्च्छा (ख) पिपासा (ग) उन्माद (घ) उपरोक्त सभी
(446) श्लेष्माधिकता में रात्रि में स्नेहपान करने कौन सा रोग नहीं हो सकता है।
(क) अरूचि (ख) आनाह (ग) पाण्डु (घ) कामला
(447) चरकानुसार स्नेह की प्रविचारणायेहोती है।
(क) 57 (ख) 20 (ग) 24 (घ) 64
(448) काश्यपानुसार स्नेह की प्रविचारणायेहोती है।
(क) 57 (ख) 20 (ग) 24 (घ) 64
(449) ‘अच्छपेय स्नेह’ निम्नलिखित में कौन सी कल्पनाहै।
(क) प्रथम कल्पना (ख) प्रथम कल्पना एवंप्रविचारणा (ग) प्रविचारणा (घ) अल्प स्नेहन
(450) ’स्नेह’ की प्रधान मात्रा का निर्देश किसमें नहीं है।
(क) गुल्म (ख) विसर्प (ग)कुष्ठ (घ)सर्पदंष्ट्र
(451) वातरक्त मेंस्नेह की कौनसी मात्रा प्रयुक्त होती है।
(क) हृस्व (ख) मध्यम (ग)उत्तम (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(452) अतिसार मेंस्नेह की कौनसी मात्रा प्रयुक्त होती है।
(क) हृस्व (ख) मध्यम (ग)उत्तम (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(453) ’मृदुकोष्ठ’ हेतु स्नेह की कौनसी मात्रा का निर्देशित है।
(क) हृस्व (ख) मध्यम (ग)उत्तम (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(454) ‘मंदबिभ्रंशा’ नाम है।
(क) स्नेह की हृस्वमात्रा (ख) स्नेह की मध्यम मात्रा (ग) स्नेह की उत्तममात्रा (घ) स्नेह कीअति मात्रा
(455) स्नेह की कौनसी मात्रा का पाचनकाल अहोरात्रहै।
(क) हृस्व (ख) मध्यम (ग) उत्तम (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(456) स्नेह की हृस्वयसी मात्रा किसने बतलायी है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(457) संशोधन हेतु स्नेह की कौनसी मात्रा प्रयुक्त होती है।
(क) हृस्व (ख) मध्यम (ग) उत्तम (घ) उर्पयुक्त सभी
(458) ’कृमिकोष्ठ’ में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(459) ’क्षतक्षीण’ में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(460) नाडीव्रण में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(461) क्रूरकोष्ठ में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) मज्जा (घ) तैल, मज्जा
(462) अस्थि-सन्धि-सिरा-स्नायु-मर्मकोष्ठ महारूजः - में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(463) जिनको वसा सात्म्य है उनको किस स्नेह का सेवन करना चाहिए।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(464) ‘घस्मरा’ व्यक्ति में किसका प्रयोग करना चाहिए है।
(क) घृत (ख) तैल (ग) वसा (घ) मज्जा
(465) केवल अच्छस्नेहसेवन से मृदुकोष्ठ व्यक्ति कितनी रात्रि में स्निग्ध हो जाता है।
(क) 5 (ख)2 (ग) 3 (घ) 7
(466) केवल अच्छस्नेहसेवन से क्रूरकोष्ठ व्यक्ति कितनी रात्रि में स्निग्ध हो जाता है।
(क) 5 (ख) 2 (ग) 3 (घ) 7
(467) ‘अल्पकफा मन्दमारूताग्रहणी’ - किस कोष्ठ के व्यक्ति में होती हैं ? (च.सू.13/69)
(क) मृदुकोष्ठ (ख) मध्य कोष्ठ (ग) क्रूरकोष्ठ (घ) बद्धकोष्ठ
(468) चरकानुसार स्नेह व्यापदों की संख्या है ?
(क) 6 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 19
(469) चरकसंहिता में ‘तक्रारिष्ट’का सर्वप्रथम उल्लेख किसके संदर्भ में आया है।
(क) स्नेहव्यापत्ति भेषज (ख) अर्श चिकित्सा (ग) उदररोग चिकित्सा (घ) ग्रहणी चिकित्सा
(470) चरकानुसार स्नेहपान के कितने दिन बाद वमन कराते है।
(क) 1 (ख) 2 (ग) 3 (घ) 7
(471) चरकानुसार स्नेहपान के कितने दिन बाद विरेचन कराते है।
(क) 1 (ख) 2 (ग) 3 (घ) 7
(472) ‘पांच प्रसृतिकी पेया’ के घटको में शामिल है।
(क) घृत, तैल (ख) वसा, मज्जा (ग) तण्डुल (घ) उपर्युक्त सभी
(473) ’प्रस्कन्दन’ किसका पर्याय है।
(क) वमन (ख) विरेचन (ग) वस्ति (घ) नस्य
(474) ‘उल्लेखन‘ किसका पर्याय है।
(क) वमन (ख) विरेचन (ग) लेखन (घ) शोधन
(475) विचारणा के योग्य रोगी है।
(क) क्लेशसहा (ख) नित्यमद्यसेवी (ग) मृदुकोष्ठी (घ) उपर्युक्त सभी
(476) चरकानुसारवंक्षण में कौनसा स्वेद कराते हैं।
(क) मृदु स्वेद (ख) मध्यम स्वेद (ग) स्वल्प स्वेद (घ) अल्प स्वेद
(477) वाग्भट्टानुसारवंक्षण में कौनसा स्वेद कराते हैं।
(क) मृदु स्वेद (ख) मध्यम स्वेद (ग) स्वल्प स्वेद (घ) अल्प स्वेद
(478) स्वेदन के अतियोग में ग्रीष्म ऋतु में वर्णित मधुर, स्निग्ध एंव शीतल आहार विहार चिकित्सा किसने बतलायी है
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(479) स्वेदन के अतियोग शीघ्र शीतोपचार चिकित्सा किसने बतलायी है
(क) चरक (ख) सुश्रुत, शारंर्ग्धर (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(480) स्वेदन के अतियोग में विसर्प रोग की चिकित्साकिसने बतलायी है
(क) चरक (ख) सुश्रुत, शारंर्ग्धर (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(481) स्वेदन के अतियोग स्तम्भन चिकित्सा किसने बतलायी है
(क) चरक (ख) सुश्रुत, शारंर्ग्धर (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(482) स्वेदन के अयोग्य रोगी है।
(क) संधिवात (ख) वातरक्त (ग) गृधसी (घ) कोई नहीं
(483) चरकानुसार किसमें स्वेदन का निषेध है।
(क) नित्य कषाय द्रव्य सेवी (ख) नित्य मधुर द्रव्य सेवी (ग)नित्य कटु द्रव्य सेवी (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(484)चरकानुसार साग्नि स्वेद की संख्या हैं ?
(क) 4 (ख) 8 (ग) 10 (घ) 13
(485) चरकानुसार निराग्नि स्वेद की संख्या हैं ?
(क) 4 (ख) 8 (ग) 10 (घ) 13
(486) चरक ने ’पिण्डस्वेद’ का अंतर्भाव किया गया है।
(क) संकर स्वेद (ख) प्रस्तर स्वेद (ग) नाडी स्वेद (घ) जेन्ताक स्वेद
(487) भावप्रकाश के अनुसार 4 मुर्हूत काल तक किया जाने वाला स्वेद है।
(क) अवगाहन (ख) प्रस्तर स्वेद (ग) नाडी स्वेद (घ) जेन्ताक स्वेद
(488) नाडी स्वेद मे नाडी की आकृति होती है।
(क) घुमावदार (ख) हाथी की सूड समान (ग) ऽ आकार की (घ) सीधी
(489) जेन्ताक स्वेद में कूटागार का विस्तार होता है।
(क) 8 अरत्नि (ख) 16 अरत्नि (ग) 26 अरत्नि (घ) पुरूषसम प्रमाण
(490) हन्सतिका की अग्नि का प्रयोग कौनसे स्वेद में किया जाता है।
(क) कूर्ष (ख)कूप (ग) कुटी (घ) होलाक
(491) चरकानुसार निराग्नि स्वेदहै।
(क) अवगाहन (ख) परिषेक (ग) बहुपान (घ) अध्व
(492) सुश्रुत ने कौनसा निराग्नि स्वेद नहीं माना है।
(क) उपनाह (ख)क्षुधा, भय (ग) मद्यपान (घ) उपर्युक्त सभी
(493) चरकसंहिता के स्वेदाध्याय में कितने स्वेद संग्रह बताए गए है।
(क) त्रयोदश (ख) दश (ग) अष्ट (घ) षट्
(494) अष्टांग संग्रहकार ने उष्म स्वेद के अतंगर्त कितने स्वेदों का वर्णन किया है ?(अ.सू.26/7)
(क) 8 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 13
(495) चरकानुसार वमन विरेचन व्यापदों की संख्या है।
(क) 8 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 15
(496) सुश्रुतानुसार वमन विरेचन व्यापदों की संख्या है।
(क) 8 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 15
(497) ‘मलापह रोगहरं बलवर्णप्रसादनम्’ - किसका कर्म है।
(क) आहार (ख) ओज (ग) रक्त (घ) संसोधन से लाभ
(498) वमन के पश्चात् प्रयुक्त धूम्रपान है।
(क) स्नैहिक (ख) प्रायोगिक (ग) वैरेचनिक (घ) उपर्युक्त सभी
(499) चरकसंहिता के उपकल्पनीय अध्याय में वर्णित संसर्जन क्रम में वमनविरेचन की प्रधानशुद्धि में सर्वप्रथम देय है।
(क) मण्ड (ख) पेया (ग) विलेपी (घ) यवागू
(500) चरक ने विरेचन हेतु त्रिवृत्त कल्क की मात्रा बतलायी है।
(क) 1 पल (ख) 1 अक्ष (ग) 1 प्रसृत (घ) 1 शुक्ति
(501) चरकानुसार ‘आध्मानमरूचिश्छर्दिरदौर्बल्यं लाघवम्’ - किसका लक्षण हैं।
(क) सम्यग्विरिक्त (ख) अविरिक्त (ग) दुर्विरिक्त (घ) वमनेऽति
(502) चरकानुसार ‘दौर्बल्यं लाघवं ग्लार्निव्याधिनामणुता रूचिः’ - किसकालक्षण हैं।
(क) सम्यग्विरिक्त (ख) अविरिक्त (ग) दुर्विरिक्त (घ) वमनेऽति
(503) 'दोषाः कदाचित् कुप्यन्ति जिता लंघनपाचनैः। जिताः संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरूद्भवः'- किस आचार्य का कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) चक्रपाणि
(504) संशोधन के अतियोग की चिकित्सा हैं।
(क) सर्पिपान (ख) मधुरौषधसिद्ध तैल का पान (ग) अनुवासन वस्ति (घ) उपरोक्त सभी
(505) ‘उर्ध्वगत वातरोग एवं वाक्ग्रह’- किसके अतियोग के लक्षण हैं।
(क) वमन (ख) विरेचन (ग) दोनों (घ) उपर्युक्त कोई नहीं
(506) चरक संहिता में ’स्वभावोपरमवाद’ का वर्णन कहॉ मिलता है।
(क) चू.सू.अ.15 (ख) चू.सू.अ.16 (ग) चू.सू.अ.17 (घ) चू.सू.अ.18
(507) 'स्वभावात् विनाशकारणनिरपेक्षात् उपरमो विनाशः स्वभावोपरमः।' - किसका कथन है।
(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) आत्रेय (घ) वाग्भट्ट
(508) ‘स्वभावोपरमवाद’ का मुख्य अभिप्राय है।
(क) स्वभावेन निरोध (ख) स्वभावेन प्रकृतिः (ग) स्वभावेन वृद्धि (घ) स्वभावेनोत्पत्तिः
(509) जायन्ते हेतु वैषम्याद् विषमा देहधातवः। हेतु साम्यात् समास्तेषां .....सदा।।
(क) वृद्धि (ख) हानि (ग) स्वभावोपरमः (घ) सम
(510) याभिः क्रियाभिः जायन्ते शरीरे धातवः समाः। सा ..... विकारणां कर्म तत् भिषजां मतम्।।
(क) भेषज (ख) चिकित्सा (ग) औषध (घ) दोषाणां
(511) चरक के मत से शिरोरोग का सामान्य कारण नहींहै।
(क) दिवास्वप्न (ख) रात्रि जागरण (ग) प्रजागरण (घ) प्राग्वात
(512) शिर को उत्तमांग की संज्ञा किसने दी है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(513) माधव निदान के अनुसार शिरो रोगोंकी संख्या है ?
(क) 5 (ख) 10 (ग) 11 (घ) 13
(514) ‘शीतमारूतसंस्पर्शात्’ कौनसे रोग का निदान है ?
(क) वातिक शिरोरोग (ख) शीतपित्त (ग) दोनों (घ) कोई नहीं
(515) ‘मद्य सेवन्’ से कौनसा शिरोरोग होताहै ?
(क) वातज (ख)पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(516) ‘आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरूस्निग्धातिभौजनै’ - कौनसे रोग का निदानहै ?
(क) कफजशिरोरोग (ख) प्रमेह (ग) मधुमेह (घ) उपर्युक्त सभी
(517) ‘आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि’ - कौनसे रोग कानिदानहै ?
(क) कफज शिरोरोग (ख) वातरक्त (ग) प्रमेह (घ) उपर्युक्त सभी
(518) ‘व्यधच्छेदरूजा’ कौनसे शिरोरोग का कारणहै।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कृमिज (घ) सन्निपातज
(519) आचार्य सुश्रुत ने कौनसा हृदय रोगनहीं माना है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कृमिज (घ) सन्निपातज
(520) 'दर' (हदय में मरमर ध्वनि की प्रतीति होना) - कौनसे हृदय रोग का लक्षण हैं।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) कृमिज
(521) कफज हृद्रोग का निदान है।
(क) चिन्तन (ख) अतिचिन्तन (ग) अचिन्तन (घ) उपर्युक्त सभी
(522) हृदयं स्तब्धं भारिकं साश्मगर्भवत्- किसका लक्षण है ?
(क) कफज हृदय रोग (ख) कफज अर्बुद (ग) वातिक ग्रहणी (घ) कफज ग्रहणी
(523) चरकानुसार ‘सान्निपातिक हृद्रोग’ होता है।
(क) साध्य (ख) कष्टसाध्य (ग) याप्य (घ) प्रत्याख्येय
(524) चरक के मत से दोष के विकल्प भेद होते है।
(क) 57 (ख) 62 (ग) 63 (घ) 3
(525) चरकानुसार क्षय के भेद होते है।
(क) 5 (ख) 10 (ग) 2 (घ) 18
(526) सुश्रुतानुसार क्षय के भेद होते है।
(क) 5 (ख) 10 (ग) 2 (घ) 18
(527) चरकानुसार निम्नलिखित मे कौनसा रस क्षय का लक्षण नहीं है।
(क) शूल्यते (ख) घट्टते (ग) हृदयं ताम्यति (घ) हृदयोक्लेद
(528) परूषा स्फिटिता म्लाना त्वग् रूक्षा’ किस क्षय के लक्षण है।
(क) रसक्षय (ख) कफक्षय (ग) रक्तक्षय (घ) मज्जाक्षय
(529) चरकानुसार ’संधिस्फुटन’ कौनसी धातु केक्षय का लक्षण है।
(क) मांस (ख) मेद (ग) अस्थि (घ) मज्जा
(530) चरकानुसार ’संधिशैथिल्य’ कौनसी धातु केक्षय का लक्षण है।
(क) मांस (ख) मेद (ग) अस्थि (घ) मज्जा
(531) चरकानुसार ’शीर्यन्त इव चास्थानि दुर्बलानि लघूनि च। प्रततं वातरोगीणि’ - लक्षण है।
(क) मांस (ख) मेद (ग) अस्थि (घ) मज्जा
(532) ’दौर्बल्यं मुखशोषश्च पाण्डुत्वं सदनं श्रमः’ - चरकानुसार कौनसी धातु केक्षय का लक्षण है।
(क) रस (ख) शुक्र (ग) मूत्र (घ) रक्त
(533) चरकानुसार ’पिपासा’ किसके क्षय का लक्षण है।
(क) रस (ख) शुक्र (ग) मूत्र (घ) रक्त
(534) विभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं व्यायति व्यधितेन्द्रियः। दुश्छायो दुर्मना रूक्षः क्षामश्चैव - चरकानुसारकिसका लक्षण है।
(क) ओजनाश (ख) ओजक्षय (ग) ओजविस्रंस (घ) ओजच्युति
(535) चरकानुसार गर्भस्थ ओज का वर्ण होता है।
(क) सर्पिवर्ण (ख) मधुवर्ण (ग) रक्तमीषत्सपीतकम् (घ) श्वेत वर्ण
(536) चरकानुसार हदयस्थ ओज का वर्ण होता है।
(क) सर्पिवर्ण (ख) मधुवर्ण (ग) रक्तमीषत्सपीतकम् (घ) श्वेत वर्ण
(537) ‘तन्नाशान्ना विनश्यति’ - चरक ने किसके संदर्भ में कहा गया है।
(क) रक्त (ख) ओज (ग) शुक्र (घ) प्राणायतन
(538) प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मन् शरीरिणाम्।- किस आचार्य का कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(539) मधुमेह के निदान एंव सम्प्राप्ति का वर्णन चरक संहिता के किस स्थान में मिलता है।
(क) सूत्र स्थान (ख) निदान स्थान (ग) चिकित्सा स्थान (घ) विमान स्थान
(540) तैरावृत्तगतिर्वायुरोज आदाय गच्छैति। यदा बस्तिं ..... मधुमेहः प्रवर्तते ?(च.सू.17/80)
(क) तदासाध्यो (ख) तदा कृच्छ्रो (ग) तदा याप्यो (घ) तदासाध्यो
(541) मधुमेह की उपेक्षा करने से शरीर के किस स्थान पर दारूण प्रमेहपिडिकाए उत्पन्न हो जाती है।
(क) मांसल प्रदेश में (ख) मर्म स्थानमें (ग) संधियों में (घ) उपर्युक्त सभी
(542) प्रमेहपिडका की संख्या 9 किसने बतलायी है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) भोज
(543)'कुलत्थिका' नामक प्रमेह पिडिका का वर्णन किस आचार्य ने किया हैं।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) भोज
(544)'अरूंषिका' नामक प्रमेह पिडिका का वर्णन किस आचार्य ने किया हैं।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) भोज
(545) पिडका नातिमहतीक्षिप्रपाका महारूजा।- प्रमेह पिडिका है।
(क) जालिनी (ख) सर्षपिका (ग) अजली (घ) विनता
(546) पृष्ठ और उदर में होने वाली प्रमेह पिडिका है।
(क) जालिनी (ख) सर्षपिका (ग) अजली (घ) विनता
(547) ‘रूजानिस्तोदबहुला’कौनसीप्रमेहपिडका का लक्षण है।
(क) जालिनी (ख) सर्षपिका (ग) अजली (घ) विनता
(548) ’विसर्पणी’ प्रमेहपिडका है।
(क) जालिनी (ख) सर्षपिका (ग) अजली (घ) विनता
(549) ’महती नीला’ प्रमेहपिडका है।
(क) जालिनी (ख) सर्षपिका (ग) अजली (घ) विनता
(550) ’कृच्छ्रसाध्य’ प्रमेहपिडका नहीं है।
(क) शराविका (ख) कच्छपिका (ग) जालिनी (घ) विनता
(551) चरकानुसार विद्रधि के कितने भेद होते है।
(क) 2 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 8
(552) सुश्रुतानुसार विद्रधि के कितने भेद होते है।
(क) द्विविध (ख) पंचविध (ग) षड्विध (घ) सप्तविध
(553) ‘जृम्भा’ कौनसी विद्रधि का लक्षण है ?
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) त्रिदोषज
(554) ‘वृश्चिक दंश सम वेदना’ किसकालक्षण है।
(क) पच्यमान विद्रधि (ख) पच्यमान शोफ (ग) आमवात (घ) उपरोक्त सभी
(555) 'तिल, माष, एवं कुलत्थके क्वाथ के समान स्राव निकलना'- कौनसी दोषज विद्रधि का लक्षण है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(556) अभ्यांतर विद्रधि का कौनसा स्थान चरक ने नहीं माना है।
(क) कुक्षि (ख)गुदा (ग) वंक्षण (घ) वृक्क
(557) ’हिक्का’ कौनसी अभ्यांतर विद्रधि का लक्षण है।
(क) हृदय (ख)यकृत (ग) प्लीहा (घ) नाभि
(558) ’उच्छ्वासापरोध’ कौनसी अभ्यांतर विद्रधि का लक्षण है।
(क) हृदय (ख) यकृत (ग) प्लीहा (घ) नाभि
(559) ’पृष्ठकटिग्रह’ कौनसी अभ्यांतर विद्रधि का लक्षण है।
(क) कुक्षि (ख)वस्ति (ग) वंक्षण (घ) वृक्क
(560) ’सक्थिसाद’ कौनसी अभ्यांतर विद्रधि का लक्षण है।
(क) कुक्षि (ख)वस्ति (ग) वंक्षण (घ) वृक्क
(561) ’वातनिरोध’ कौनसी अभ्यांतर विद्रधि का लक्षण है।
(क) कुक्षि (ख) वस्ति (ग) वंक्षण (घ) गुदा
(562) क्रियाशरीरे दोषाणां कतिधा गतयः ?
(क) दशः (ख) नवः (ग) षट् (घ) पंचदशः
(563) आशयापकर्ष दोषों की कितनी गतियॉ होतीहै।
(क) 05 (ख) 07 (ग) 10 (घ) 09
(564) चरकानुसार प्राकृत श्लेष्मा कहलाता हैं।
(क) बल (ख) ओज (ग) स्वास्थ्य (घ) अ, ब दोनों
(565) चरकानुसार दोषों की त्रिविध गतियों में सम्मिलित नहीं हैं।
(क) ऊर्ध्व गति (ख) अधः गति (ग) तिर्यक् गति (घ) विषम गति
(566) चरकानुसार दोषों की त्रिविध गतियों में सम्मिलित नहीं हैं।
(क) क्षय (ख) वृद्धि (ग) स्थान (घ) प्रसर
(567) सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः। - सूत्र किस अध्याय में वर्णित है।
(क) वातकलाकलीय (ख) वातव्याधिचिकित्सा (ग) दीर्घजीवतीय (घ) कियन्तःशिरसीय
(568) चरक ने शोथ के भेद कितने माने है।
(क) 3 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(569) शोथ के पृथु, उन्नत और ग्रंथित भेद किसने माने है।
(क) चरक (ख) माधव (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(570) शोथ के उर्ध्वगत, मध्यगत और अधोगत भेद किसने माने है।
(क) चरक (ख) माधव (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(571) कौनसा शोथ दिवाबली होता है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(572) कौनसा शोथ ‘सर्षपकल्कावलिप्त’ होता है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(573) ‘पूर्व मध्यात् प्रशूयते’- कौनसा शोथ का लक्षणहै।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(574) ‘शोथो नक्तं प्रणश्यति’- कौनसा शोथ का लक्षणहै।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(575) ‘निपीडतो नोन्नमति श्वयथु’- कौनसा शोथ का लक्षणहै।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(576) चरक ने शोथ के उपद्रव कितने माने है।
(क) 9 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(577) चरकानुसार निम्नलिखित में कौन सा शोथ का उपद्रव नहीं है।
(क) छर्दि (ख) ज्वर (ग) श्वास (घ) दाह
(578) जो शोथ पुरूष अथवा स्त्री के गुह्य स्थान से उत्पन्न होकर सम्पूर्ण शरीर फैल जाये वह शोथ .....होता है।
(क) साध्य (ख) कष्टसाध्य (ग) याप्य (घ) असाध्य
(579) प्रकुपित कफ गले अन्तःप्रदेश में जाकर स्थिर हो जाये, शीघ्र ही शोथ उत्पन्न कर दे तो वह है ?
(क)गुल्म (ख) गलगण्ड (ग) गलग्रह (घ) गलशुण्डिका
(580) गलशुण्डिका में शोथ का स्थान होता है ?
(क) जिहृवा मूल (ख) जिहृवा अग्र (ग) काकल प्रदेश (घ) गल प्रदेश
(581) यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते - किसके लिए कहा गया है।
(क) विसर्प (ख) पिडका (ग) पिल्लु (घ) नीलिका
(582) यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्योऽवतिष्ठते शनैः संजनयेच्छोफं - है।
(क) गलगण्ड (ख) गलग्रह (ग) रोहिणी (घ) गण्डमाला।
(583) तीनों दोष एक ही समय में एक स्थान प्रकुपित होकर जिहृवामूल में कौनसा भंयकर शोथ उत्पन्न करते है।
(क) गलगण्ड (ख) गलग्रह (ग) रोहिणी (घ) कर्णमूलशोथ
(584) उदररोगशोथ में दोष अधिष्ठान का स्थान होता है।
(क) आमाशय (ख) पक्वाशय (ग) त्वङ्मांसान्तर आश्रित (घ) महास्रोत्रस
(585) चरकानुसार ‘आनाह’ किस दोष के प्रकुपित हाने से होता है
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)त्रिदोष
(586) चरकानुसार ‘कर्णमूलशोथ’ किस दोष के प्रकुपित हाने से होताहै
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)त्रिदोष
(587) चरकानुसार ‘उपजिह्न्का शोथ’ किस दोष के प्रकुपित हाने से होता है
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)त्रिदोष
(588) चरकानुसार ‘रोहिणी’ किस दोष के प्रकुपित हाने से होता है
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)त्रिदोष
(589) चरकानुसार ‘शंखक शोथ’ किस दोष के प्रकुपित हाने से होता है
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)त्रिदोष
(590) चरक संहिता में शंखक शोथ का वर्णन कहॉ मिलता है।
(क) त्रिशोधीय अध्याय (ख) त्रिमर्मीय चिकित्साअध्याय (ग) त्रिमर्मीयसिद्धिअध्याय (घ) कोई नहीं
(591) चरक संहिता में शंखक रोग का वर्णन कहॉ मिलता है।
(क) त्रिशोधीय अध्याय (ख) त्रिमर्मीय चिकित्साअध्याय (ग) त्रिमर्मीयसिद्धिअध्याय (घ) कोई नहीं
(592) त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोः भवति जीवितम्। कुशलेन त्वनुक्रान्तः क्षिप्रं संपद्यते सुखी - किसके लिए कहा गया है।
(क) शंखक रोग (ख) रोहिणी (ग) रक्तज अधिमन्थ (घ) उर्पयुक्त सभी
(593) मेधा किस दोष का कर्म है।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ) कोई नहीं
(594) ’न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति धुर्वा स्थितिः’ का वर्णन कहॉ है।
(क) च.सू.अ.16 (ख) च.सू.अ.17 (ग) च.सू.अ.18 (घ) च.सू.अ.19
(595) त एवापरिसंख्येया ..... भवनि हि।
(क) भिद्यमाना (ख) छिद्यमाना (ग) विद्यमाना (घ) रूद्ररूपा
(595) चरकानुसार सामान्यज रोगों की संख्याहै।
(क) 40 (ख) 80 (ग) 48 (घ) 56
(596) चरकानुसार ‘ग्रहणीद्रोष’के भेद होते है।
(क) 4 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(597) चरकानुसार ‘प्लीह दोष’के भेद होते है।
(क) 4 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(598) ‘तृष्णा’के भेद होते है।
(क) 4 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(599) चरक ने ‘प्रतिश्याय’के भेद बतलाए है।
(क) 6 (ख) 5 (ग)4 (घ) 3
(600) चरक ने ‘अरोचक’के भेद बतलाए है।
(क) 5 (ख) 4 (ग) 6 (घ) 3
(600) चरक ने ‘उदावर्त’के भेद बतलाए है।
(क) 3 (ख) 4 (ग) 6 (घ) 8
(601) चरक ने अष्टौदरीय अध्याय में 5 भेद बाले कुल कितने रोग बताए है।
(क) 9 (ख) 10 (ग) 11 (घ) 12
(602) चरक ने अष्टौदरीय अध्याय में 6भेद बाले कुल कितने रोग बताए है।
(क) 2 (ख) 5 (ग) 6 (घ) 7
(603) चरकानुसार ज्वर के भेद है।
(क) 2 (ख) 5 (ग) 8 (घ) 7।
(604) चरक ने‘महागद’ की संज्ञा किसे दी है।
(क) उरूस्तंभ (ख) सन्यास (ग) अतत्वाभिनिवेश (घ) हलीमक
(605) चरक के मत से वह त्रिदोषज रोग जो मन व शरीर को अधिष्ठान बनाकर उत्पन्न होता है ?
(क) उरूस्तंभ (ख) सन्यास (ग) अतत्वाभिनिवेश (घ) अपस्मार
(606) चरक के मत से ‘आम और त्रिदोष समुत्थ’ रोग है ?
(क) उरूस्तंभ (ख) सन्यास (ग) महागद (घ) अजीर्ण
(607) दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्- किस आचार्य का कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(608) असात्मेन्द्रियार्थ संयोग, प्रज्ञापराध और परिणाम-चरकानुसार किन रोगों के कारण है।
(क) निज (ख) आगन्तुज (ग) दोनों (घ) कोई नहीं
(609) चरकानुसार पित्त का विशेष स्थान है।
(क) आमाशय (ख) पक्वाशय (ग) नाभि (घ) पक्वामाशयमध्य
(610) चरकानुसार कफ का विशेष स्थान है।
(क) आमाशय (ख) उरः प्रदेश (ग) ऊर्ध्व प्रदेश (घ) हृदय प्रदेश
(611) सुश्रुतानुसार कफ का विशेष स्थान है।
(क) आमाशय (ख) पक्वाशय (ग) उरः प्रदेश (घ) हृदय प्रदेश।
(612) चरक मतेन ‘रस’ किसका स्थान है
(क) वातस्थान (ख) पित्तस्थान (ग) कफस्थान (घ) ब, स दोनो
(613) चरक मतेन ‘आमाशय’ किसका स्थान है
(क) वातस्थान (ख) पित्तस्थान (ग) कफस्थान (घ) ब, स दोनो
(614) ’निम्नलिखित कौन सी व्याधि सामान्यज, नानात्मज दोनों में उल्लेखित है।
(क) उदावर्त (ख) उरूस्तंभ (ग) रक्तपित्त (घ) उर्पयुक्त सभी
(615) ’निम्नलिखित कौन सी व्याधि सामान्यज, नानात्मज दोनों में उल्लेखित नहीं है।
(क) हिक्का (ख) उदावर्त (ग) पाण्डु (घ) कामला
(616) ’तिमिर’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(617) ’त्वगवदरण’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(618) ’उरूस्तम्भ’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(619) ’मन्यास्तम्भ’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(620) ’हिक्का’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(621) ’विषाद’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) रक्त (घ)कोई नहीं
(622) हृदद्रव, तमःप्रवेश,शीताग्निता क्रमशः किसके नानात्मज विकारहै।
(क) वात, पित्त, कफ (ख) कफ, रक्त, पित्त (ग) कफ, वात, पित्त (घ) वात, पित्त, रक्त
(623) ’उदर्द’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(624) ’धमनीप्रतिचय’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) वात (ख) पित्त (ग) कफ (घ)रक्त
(625) 10 रक्तज नानात्मज विकार किसने मानेहै।
(क) शारर्ग्धर (ख) माधव (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(626) ’रक्तपित्त’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) रक्त (ख) पित्त (ग) दोनों (घ) कोई नहीं
(627) ’रक्तमण्डल’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) रक्त (ख) पित्त (ग) दोनों (घ) कोई नहीं
(628) ’रक्तकोठकिसका नानात्मज विकारहै।
(क) रक्त (ख) पित्त (ग) दोनों (घ)उपरोक्त कोई नहीं
(629) ’रक्तनेत्रत्वं’ किसका नानात्मज विकारहै।
(क) रक्त (ख) पित्त (ग) दोनों (घ)कोई नहीं
(630) चरक नेवात को कौनसी संज्ञा दीहै।
(क) अचिर्न्त्यवीर्य (ख) आशुकारी (ग) अव्यक्त (घ) अमूर्त
(631) ’अष्टौनिन्दतीय’ अध्याय चरकोक्त कौनसेचतुष्क में आता है।
(क) निर्देश (ख) कल्पना (ग) रोग (घ) योजना
(632) चरकानुसार अतिस्थूलता जन्य दोष होते है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8
(633) निम्न में से कौनसा रोग अतिकृशता के कारण होता है।
(क) गुल्म (ख) अर्श (ग) ग्रहणी (घ) उर्पयुक्त सभी
(634) अतिस्थूलव अतिकृश की चिकित्सा क्रमशःहै।
(क) कर्षण व वृंहण (ख) वृंहण व कर्षण (ग) लंघन व वृंहण (घ) वृंहण व लंघन
(635) अतिस्थूलता की चिकित्सा सिद्वांन्त है।
(क) गुरू आहार व संतर्पण (ख) लघु आहार व संतर्पण (ग) गुरू व अपतर्पण (घ) लघु व अवतर्पण
(636) अतिकृशता की चिकित्सा सिद्वांन्त है।
(क) गुरू आहार व संतर्पण (ख) लघु आहार व संतर्पण (ग) गुरू व अपतर्पण (घ) लघु व अवतर्पण
(637) स्थौल्यकार्श्ये कार्श्य समोपकरणौ हि तो। यद्युभौ व्याधिरागच्छेत् स्थूलमेवाति पीडयेत। -किसका कथन हैं।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) माधव
(638) ’काश्यमेव वरं स्थौल्याद् न हि स्थूलस्य भेषजम्’। - किसका कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) माधव
(639) वाग्भट्ट मतेन कस्यरोगस्य नौषधम् ?
(क) मधुमेह (ख) संयास (ग) स्थौल्य (घ) कार्श्य
(640) ‘स्फिक्, ग्रीवा व उदर शुष्कता’चरकानुसार किसका लक्षण है।
(क) मांस धातु क्षय (ख) मेद धातु क्षय (ग) अतिकार्श्य (घ) अ, स दोनों
(641) अष्टौनिन्दितीय अध्याय में वर्णित रोग है।
(क) दुष्ट रसज (ख) दुष्ट रक्तज (ग) दुष्ट मेदज (घ) दुष्ट मांसज
(642) चरक ने निम्न किसकी चिकित्सा में वृहत पंचमूल का प्रयोग शहद के साथ निर्देशित किया है।
(क) प्रतिश्याय (ख) अतिस्थौल्य (ग) अतिकार्श्य (घ) पित्ताश्मरी
(643) अतिस्थूलता की चिकित्सा में प्रयुक्त औषध नहीं है।
(क) तक्रारिष्ट (ख) यवामलक चूर्ण (ग) शिलाजीत (घ) रसायन, बाजीकरण
(644) यदा तु मनसि क्लन्ति कर्मात्मानः क्लमान्विताः। विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा ..... मानवः।।
(क) निद्रां (ख) स्वपिति (ग) जागरति (घ) स्वप्नः
(645) चरकानुसार ‘ज्ञान अज्ञान’ किस पर निर्भर है।
(क) निद्रा (ख) कफ (ग) पित्त (घ) अ, ब दोनो
(646) दिवास्वप्न के योग्य रोगी नहीं है।
(क) तृष्णा (ख) अतिसार (ग) शूल (घ) शोथ
(647) दिवास्वप्न के योग्य ऋतु है।
(क) ग्रीष्म (ख) वर्षा (ग) शिशिर (घ) प्रावृट्
(648) दिवास्वप्न निषेध नहीं है।
(क) मेदस्वी (ख) कण्ठरोगी (ग) दूषीविर्षात (घ) अतिसारी
(649) चरकानुसार ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतु में दिवास्वप्न से किसका प्रकोप होता है।
(क) कफ (ख) कफपित्त (ग) त्रिदोष (घ) वात
(650) सुश्रुतानुसार ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतु में दिवास्वप्न से किसका प्रकोप होता है।
(क) कफ (ख) कफपित्त (ग) त्रिदोष (घ) वात
(651) दिवास्वप्न जन्य विकार है।
(क) हलीमक (ख) गुरूगात्रता (ग) इन्द्रिय विकार (घ) उपर्युक्तसभी
(652) रात्रौ जागरण रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा। अरूक्षं अनभिष्यन्दि .....।
(क) प्रजारण (ख) त्वासीनं प्रचलायितम् (ग) भुक्त्वा च दिवास्वप्नं (घ) सम निद्रा
(653) .....समुत्थे च स्थौल्यकार्श्ये विशेषतः।
(क) स्वप्नाहार (ख) रस निमित्तमेव (घ) आहार निद्रा ब्रह्मचर्य (ग) निद्रा
(654) चरक ने अतिनिद्रा की चिकित्सा में निम्न में किसका निर्देश किया है।
(क) शिरोविरेचन (ख) कायविरेचन (ग) रक्तमोक्षण (घ) उपर्युक्तसभी
(655) चरक निद्रानाश के कारण बताएॅ है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8
(656) चरक निद्रा के भेद माने है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 3
(657) सुश्रुत निद्रा का भेद नहीं माना है।
(क) वैष्णवी (ख) व्याध्यनुवर्तनी (ग) वैकारिकी (घ) तामसी
(658) भूधात्री निद्रा हैं -
(क) तमोभवा (ख) रात्रिस्वभावप्रभवा (ग) वैकारिकी (घ) आगन्तुकी
(659) कौनसी निद्रा व्याधि को निर्दिष्ट नहीं करती है।
(क) श्लेष्मसमुद्भवा (ख) मनःशरीरश्रमसम्भवा (ग) आगन्तुकी (घ) तमोभवा
(660) समसंहनन पुरूष का वर्णन किस आचार्य ने कियाहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(661) स्वस्थ पुरूष का वर्णन किस आचार्य ने कियाहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(662) दशविध निन्दित बालकों का वर्णन किस आचार्य ने कियाहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(663) 'स्थूल पर्वा' - किसका लक्षण है।
(क) अतिस्थूल (ख) अतिकृश (ग) दोनों (घ) कोई नहीं
(664) स्थूलता से मुक्त होने के उपाय है।
(क) प्रजागरण (ख) व्यायाम (ग) व्यवाय (घ) उपर्युक्त सभी
(665) रस निमित्तमेव स्थौल्यं कार्श्य च। - किस आचार्य का कथनहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(666) निद्रानाश की चिकित्सा है ?
(क) स्नान (ख) शाल्यन्न (ग) मद्य (घ) उपर्युक्तसभी
(667) निद्रानाश का हेतुनहीं है ?
(क) कार्य (ख) काल (ग) वय (घ) विकार
(668) सुश्रुत निद्रा के भेद माने है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 3
(669) वाग्भट्ट निद्रा के भेद माने है।
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 3
(670) स्वाभावात् निद्रा- का वर्णन किस आचार्य ने किया है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(671) चरक सूत्रस्थान अध्याय - 22 का नाम है।
(क) महारोगाध्याय (ख) अष्टौनिन्दतीय (ग) संतर्पणीय (घ) लंघन वृंहणीय
(672) लंघन, बृंहण, रूक्षण, स्तम्भन, स्वेदन, स्नेहन - कहलाते है।
(क) षट्कर्म (ख) षट्क्रिया (ग) षट्क्रियाकाल (घ) षड्विध उपक्रम
(673) ‘सर एवंस्थिर’ दोनों गुण कौनसे द्रव्यों में मिलतेहै।
(क) स्नेहन (ख) लंघन (ग) स्वेदन (घ) रूक्षण
(674) ‘स्निग्ध एवं रूक्ष’ दोनों गुण कौनसे द्रव्यों में मिलतेहै।
(क) स्नेहन (ख) लंघन (ग) स्वेदन (घ) रूक्षण
(675) ‘स्थूलपिच्छिलम्’गुण कौनसे द्रव्यों में मिलतेहै।
(क) बृंहण (ख) स्नेहन (ग) स्तम्भन (घ) रूक्षण
(676) ‘प्रायो मन्दं स्थिरं श्लक्षणं द्रव्यं .....उच्यते।
(क) बृंहणम् (ख) स्नेहनम् (ग) स्तम्भनं (घ) रूक्षणम्
(677) प्रायो मन्दं मृ दु च यद् द्रव्यं तत् ..... मतम्।
(क) बृंहणम् (ख) स्नेहनम् (ग) स्तम्भनं (घ) रूक्षणम्
(678) शीतं मन्दं मृदु श्लक्षणं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम्। - कौनसे द्रव्योंके गुण है।
(क) बृंहण (ख) स्नेहन (ग) स्तम्भन (घ) रूक्षण
(679) द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलम् गुरू शीतलम्। - कौनसे द्रव्योंके गुण है।
(क) बृंहण (ख) स्नेहन (ग) स्तम्भन (घ) रूक्षण
(680)चरक ने लंघन के भेद माने है।
(क) 2 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 3
(681) चरकोक्त लंघन के प्रकारों में द्रव्यरूप लंघन है -
(क) 7 (ख) 10 (ग) 5 (घ) 6
(682) वाग्भट्ट लंघन के भेद माने है।
(क) 2 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 3
(683) शमन किसका भेद है।
(क) चिकित्सा (ख) द्रव्य (ग) लंघन (घ) उपर्युक्तसभी
(684) शमन किसका पर्याय है।
(क) चिकित्सा (ख) द्रव्य (ग) लंघन (घ) उपर्युक्तसभी
(685) येषां मध्यबला रोगाः कफपित्त समुत्थिताः। - में लंघन का कौनसा प्रकार उपयुक्त है।
(क) संशोधन (ख) दीपन (ग) पाचन (घ) आतप सेवन
(686) चरक ने निम्न किस व्याधि में पाचन द्वारा लंघन का निर्देश किया है।
(क) हृदयरोग (ख) अतिसार (ग) विबंध (घ) उपर्युक्तसभी
(687) वातविकार रोगी में लंघन हेतु उपयुक्त ऋतु है।
(क) शिशिर (ख) ग्रीष्म (ग) हेमन्त (घ) बंसत
(688) नित्य स्त्रीमद्यसेवी में बृंहण हेतु उपयुक्त ऋतु है।
(क) शिशिर (ख) ग्रीष्म (ग) हेमन्त (घ) बंसत
(689) किस व्याधि से ग्रसित कार्श्य रोगी को क्रव्यादमांस का प्रयोग करना चाहिए।
(क) शोष (ख) अर्श (ग) ग्रहणी (घ) उपर्युक्तसभी
(690) ‘अभिष्यन्दी रोगी’में कौनसे उपक्रम का प्रयोग करना चाहिए।
(क) स्नेहन (ख) लंघन (ग) स्वेदन (घ) रूक्षण
(691) ‘क्षाराग्निदग्ध रोगी’में कौनसे उपक्रम का प्रयोग करना चाहिए।
(क) स्नेहन (ख) स्तंभन (ग) स्वेदन (घ) रूक्षण
(692) हनुसंग्रहःहृद्वर्चोनिग्रहश्च - किसके अतियोग का लक्षण हैं।
(क) लंघन (ख) स्तंभन (ग) बृंहण (घ) रूक्षण
(693) निम्न में से कौनसा द्रव्य रूक्षता कारक है।
(क) तक्र (ख) खली (ग) पिण्याक (घ) उपर्युक्तसभी
(694) संतर्पणजन्य रोग नहीं है।
(क) पाण्डु (ख) शोफ (ग)क्लैव्य (घ) प्रलाप
(695) अपतर्पणजन्य रोग नहीं है।
(क) ज्वर (ख) विण्मूत्रसंग्रह (ग) उन्माद (घ) हृदयव्यथा
(696) संतर्पण एंव अपतर्पण दोनों जन्य रोग है।
(क) ज्वर (ख) मूत्रकृच्छ्र (ग) अरोचक (घ) कुष्ठ
(697) संतर्पणजन्य की रोगों की चिकित्सा है।
(क) वमन (ख) विरेचन (ग) रक्तमोक्षण (घ) उपयुर्क्त सभी
(698) संतर्पणजन्य की रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त रत्न है।
(क) माणिक्य (ख) प्रवाल (ग) गोमेद (घ) पुखराज
(699) मधु + हरीतिकी किन रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त होती है।
(क) संतर्पणजन्य (ख) अपतर्पणजन्य (ग) दोनों (घ) सभी असत्य
(700) मद्यविकार नाशक खर्जूरादि मन्थ किन रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त होती है।
(क) संतर्पणजन्य (ख) अपतर्पणजन्य (ग) दोनों (घ) सभी असत्य
उत्तरमाला
|
351. क |
361. ग |
371. घ |
381. ख |
391. ग |
|
352. ख |
362. ख |
372. क |
382. ग |
392. क |
|
353. क |
363. ग |
373. क |
383. ख |
393. ख |
|
354. ग |
364. ख |
374. ख |
384. ग |
394. घ |
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355. क |
365. क |
375. घ |
385. घ |
395. ख |
|
356. क |
366. ग |
376. ग |
386. ग |
396. घ |
|
357. क |
367. घ |
377. ख |
387. ग |
397. ग |
|
358. घ |
368. क |
378. ख |
388. ख |
398. घ |
|
359. क |
369. घ |
379. क |
389. क |
399. घ |
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360. ग |
370. ग |
380. क |
390. ग |
400. ग |
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401. ख |
421. क |
441. क |
461. घ |
481. घ |
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402. क |
422. ग |
442. ख |
462. ग |
482. ख |
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403. ख |
423. ग |
443. ख |
463. ग |
483. क |
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404. क |
424. ख |
444. ख |
464. घ |
484. घ |
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405. ग |
425. क |
445. घ |
465. ग |
485. ख |
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406. ग |
426. घ |
446. घ |
466. घ |
486. क |
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407. घ |
427. ग |
447. ग |
467. क |
487. क |
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408. ग |
428. घ |
448. ख |
468. घ |
488. ख |
|
409. ख |
429. क |
449. क |
469. क |
489. ख |
|
410. क |
430. घ |
450. ग |
470. क |
490. ग |
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411. ग |
431. घ |
451. ख |
471. ग |
491. ग |
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412. ख |
432. घ |
452. क |
472. घ |
492. घ |
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413. घ |
433. क |
453. ख |
473. ख |
493. घ |
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414. ग |
434. ग |
454. ख |
474. क |
494. क |
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415. ख |
435. ग |
455. ग |
475. घ |
495. ख |
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416. घ |
436. क |
456. ग |
476. ख |
496. घ |
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417. क |
437. ख |
457. ख |
477. घ |
497. घ |
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418. घ |
438. ग |
458. ख |
478. क |
498. घ |
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419. घ |
439. ग |
459. क |
479. ख |
499. घ |
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420. ख |
440. ग |
460. ख |
480. ग |
500. ख |
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501. ख |
521. ग |
541. घ |
561. घ |
581. ख |
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502. क |
522. क |
542. घ |
562. ख |
582. क |
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503. क |
523. ख |
543. घ |
563. ग |
583. ग |
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504. घ |
524. ख |
544. ग |
564. क |
584. ग |
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505. क |
525. घ |
545. ग |
565. घ |
585. क |
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506. ख |
526. ग |
546. घ |
566. घ |
586. ख |
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507. ख |
527. घ |
547. क |
567. घ |
587. ग |
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508. क |
528. ग |
548. ग |
568. क |
588. घ |
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509. ग |
529. ख |
549. घ |
569. घ |
589. ख |
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510. ख |
530. ग |
550. घ |
570. ख |
590. क |
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511. ग |
531. घ |
551. क |
571. क |
591. ग |
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512. क |
532. ख |
552. ग |
572. क |
592. ख |
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513. ग |
533. ग |
553. ग |
573. ख |
593. ख |
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514. ग |
534. ख |
554. घ |
574. क |
594. ग |
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515. ख |
535. क |
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516. क |
536. ग |
556. ख |
576. घ |
596. क |
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517. ग |
537. ख |
557. घ |
577. घ |
597. ख |
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518. ग |
538. क |
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578. ख |
598. ख |
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519. घ |
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579. ग |
599. ग |
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520. क |
540. ख |
560. ग |
580. ग |
600. क |
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601. घ |
621. क |
641. ग |
661. ख |
681. ग |
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602. क |
622. क |
642. ख |
662. घ |
682. क |
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603. क |
623. ग |
643. घ |
663. ख |
683. घ |
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604. ग |
624. ग |
644. ख |
664. घ |
684. क |
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605. ख |
625. क |
645. घ |
665. ख |
685. ख |
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606. क |
626. ख |
646. घ |
666. घ |
686. घ |
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607. घ |
627. ख |
647. क |
667. ग |
687. क |
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608. ग |
628. ख |
648. घ |
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672. घ |
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613. घ |
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653. क |
673. ग |
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679. ख |
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660. क |
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700. ख |
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