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चरकसंहिता सूत्रस्थान
आयुर्वेद प्रश्नावली- चरकसंहिता सूत्रस्थान से सम्बन्धित १००० प्रश्नोत्तर
Set 4: (701 to 1000)
(701) त्र्यूषणादिमन्थ किन रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त होती है।
(क) संतर्पणजन्य (ख) अपतर्पणजन्य (ग) दोनों (घ) सभी असत्य
(702) व्योषद्य सत्तु किन रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त होती है।
(क) संतर्पणजन्य (ख) अपतर्पणजन्य (ग) दोनों (घ) सभी असत्य
(703) चरकानुसार 'सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः' किसकी चिकित्सा है।
(क) संतर्पणजन्य रोग (ख) अपंतर्पणजन्य रोग (ग) अतिस्थौल्य (घ) अतिकार्श्य
(704) चरक ने संतर्पण के भेद माने है।
(क) 2 (ख) 10 (ग) 12 (घ) 3
(705) चिरक्षीणं रोगी का पोषण चरकमतेनहोता है .....।
(क) सद्य संतर्पण (ख) संतर्पणाभ्यास (ग) सद्यः बृंहण (घ) सत्वावजय
(706) चरकानुसार शर्करा, पिप्पलीचूर्ण, तैल, घृत, क्षौद्र और दुगुना सत्तु जल में घोलकर बनाया गया मन्थ होता है।
(क) वृष्य (क) बल्य (क) कार्श्यहर (क) स्थौल्यहर
(707) बलवर्णसुखायुषा किसका कार्य है।
(क) रूधिर (ख) ओज (ग) आहार (घ) अ, स दोनो
(708) प्राणियों के प्राण किसका अनुवर्तन करते है।
(क) रूधिर (ख) ओज (ग) आहार (घ) वायु
(709) निम्न में से रक्तज रोग है।
(क) तन्द्रा (ख) प्रमीलक (ग) उपकुश (घ) उर्पयुक्तसभी
(710) रक्तज रोगों का निदान किससे होता है।
(क) उपशय (ख) अनुपशय (ग) रूप (घ) पूर्वरूप
(711) शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि उपक्रमों भी जो शान्त नहीं हो वेरोग कौनसे होते है।
(क) असाध्य (ख) दारूण (ग) धातुगत (घ) रक्तज
(712) रक्तज रोगों की चिकित्सा है।
(क) विरेचन (ख) उपवास (ग) दोनों (घ) बस्ति
(713) रक्तमोक्षण के पश्चात् किसकी रक्षा करनी चाहिए।
(क) रस की (ख) धातु की (ग) अग्निकी (घ) वायुकी
(714) 'रक्तपित्तहरी क्रिया' - किन रोगों में करनी चाहिए ? (च.सू.24/18)
(क) पित्तज रोग (ख) रक्तजरोग (ग) संतर्पणजरोग (घ) रक्तपित्त
(715) चरक ने मद के प्रकार माने है।
(क) 2 (ख) 4 (ग) 7 (घ) 3
(716) निम्न में से कौनसा एक मनोवह स्रोतस का रोग नहींहै।
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) संन्यास (घ) उपर्युक्त सभी
(717) मूर्च्छा कौनसे स्रोतस का रोग है।
(क) रसवह (ख) रक्तवह (ग) संज्ञावह (घ) मनोवह
(718) 'सम्प्रहार कलिप्रियम्' -कौनसे मद का लक्षण है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(719) जायते शाम्यति त्वाशु मदो मद्यमदाकृति। - कौनसे मद का लक्षण है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(720) ‘भिन्नवर्च’कौनसी मूर्च्छा का लक्षण है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(721) कौनसी मूर्च्छा में अपस्मार के लक्षण देखने को मिलते है।
(क) वातज (ख) पित्तज (ग) कफज (घ) सन्निपातज
(722) ’काष्ठीभूतो मृतोपमः’ किसका लक्षण है।
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) संन्यास (घ) अपस्मार हेतु
(723) दोषों का वेग शान्त हो जाने पर शान्त हो जाने वाली व्याधियॉ है।
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) दोनों (घ) संन्यास
(724) ’विधि शोणितीय’ अध्याय चरकोक्त किस सप्त चतुष्क में आता है।
(क) निर्देश (ख) कल्पना (ग) रोग (घ) योजना
(725) ’सद्यः फलाक्रिया निर्दिष्टः’ किसमें है।
(क) अत्वाभिनिवेश (ख) मूर्च्छा (ग) संन्यास (घ) अपस्मार
(726) ’कौम्भघृत’ निर्दिष्ट है।
(क) अत्वाभिनिवेश (ख) मूर्च्छा (ग) संन्यास (घ) अपस्मार
(727) ’शिलाजतु’ निर्दिष्ट है।
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) दोनों (घ) संन्यास
(728) कौनसा रोग बिना औषधि के ठीक नहीं हो सकता है।
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) दोनों (घ)संन्यास
(729) कौन सी अवस्था के लिए चिकित्सा परम आवश्यक है ?
(क) मद (ख) मूर्च्छा (ग) संन्यास (घ) अपस्मार
(730) चरक संहिता के किस अध्याय मे सम्भाषा परिषद नहीं हुई है।
(क) यज्जः पुरूषीयं (ख) आत्रेय भद्रकाप्यीय (ग) वातकलाकलीय (घ) अन्नपानविधि
(731) चरक संहिता के यज्जःपुरूषीय अध्याय निर्दिष्टसम्भाषा परिषद में प्रश्नकर्ता कौन थे।
(क) विदेह निमि (ख) आत्रेय (ग) अग्निवेश (घ) काशिपति वामक
(732) ’कालवाद’ के प्रवर्तक है।
(क) भारद्वाज (ख) भद्रकाप्य (ग) कांकायन (घ) भिक्षु आत्रेय
(733) मौदगल्य पारीक्ष किस मत के समर्थक थे।
(क) सत्ववाद (ख) आत्मवाद (ग) रसवाद (घ) षड्धातुवाद
(734) पुरूष छः धातुओं के समूह से उत्पन्न हुआ है यह दृष्टिकोण किसका है -
(क) भद्रकाप्य (ख) हिरण्याक्ष (ग) कांकायन (घ) भिक्षु आत्रेय
(735) मातृ-पितृवाद किससे सम्बन्धित है।
(क) शरलोमा (ख) कौशिक (ग) भरद्वाज (घ) भद्रकाप्य
(736) निम्न में से आहार का कौनसा प्रकार चरक ने नहीं माना है।
(क) पान (ख) अशन (ग)भोज्य (घ) भक्ष्य
(737) आहार में अन्न की मात्रा 1 कुडव किसने बतलायी है।
(क) चरक (ख) आत्रेय (ग) अग्निवेश (घ) चक्रपाणि
(738) मृत्स्य वसा में हिततम है।
(क) चुलुकी वसा (ख) चटक वसा (ग) पाकहंस वसा (घ) कुम्भीर वसा
(739) चरकानुसार मृग मांस वर्ग में अहिततम है ?
(क) ऐण मांस (ख) गोमांस (ग) आवि मांस (घ) अजा मांस
(740) शूक धान्यों में अपथ्यतम है।
(क) कोद्रव (ख) यवक (ग) यव (घ) प्रियंगु
(741) चरकानुसार फल वर्गमें अहिततम है।
(क) आम्र (ख) मृद्वीका (ग) ऑवला (घ) लकुच
(742) चरकानुसार फल वर्ग हिततम है।
(क) आम्र (ख) मृद्वीका (ग) ऑवला (घ) लकुच
(743) चरकानुसार कन्दो में प्रधानतम है।
(क) आलु (ख) आर्द्रक (ग) सूरण (घ) वाराही
(744) सुश्रुतानुसार कन्द वर्गमें प्रधानतम है।
(क) आलु (ख) आर्द्रक (ग) सूरण (घ) वाराही
(745) पत्रशाक में श्रेष्ठतम है।
(क) सर्षप (ख)पालक (ग) मूली (घ) जीवन्ती
(746) जलचर पक्षी वसा में हिततम है।
(क) चुलुकी वसा (ख) चटक वसा (ग) पाकहंस वसा (घ) कुम्भीर वसा
(747) चरकानुसार अग्रय भावों की संख्या है।
(क) 125 (ख) 152 (ग) 155 (घ) 160
(748) वाग्भट्टानुसार श्रेष्ठ भावों की संख्या है।
(क) 125 (ख) 152 (ग) 155 (घ) 160
(749) .....पथ्यानाम्।
(क) गोघृत (ख) क्षीर (ग) हरीतकी (घ) आमलकी
(750) .....सांग्राहिक रक्तपित्तप्रशमनानां।
(क) अनन्ता (ख) उत्पल (ग) कुमुद (घ) उपर्युक्त सभी
(751) एरण्डमूलं .....।
(क) वातहराणां (ख) वृष्य त्रिदोषहराणां (ग) वृष्य वातहराणां (घ) वृष्य सर्वदोषहराणां
(752) अनारोग्यकराणां .....।
(क) विषमासन (ख) विरूद्धवीर्यासन (ग) वेगसंधारण (घ) गुरू भोजन
(753) .....हृद्यानाम्।
(क) गोघृत (ख) क्षीर (ग) मधुर (घ) अम्ल
(754) राजयक्ष्मा .....।
(क) रोगाणाम् (ख) दीर्घरोगाणाम् (ग) रोगसमूहानाम् (घ) अनुषंगिणाम्
(755) जीवन देने में श्रेष्ठ है ?
(क) क्षीर (ख) आयुर्वेद (ग) जल (घ) वैद्यसमूह
(756) जलम् .....।
(क) आश्वासकराणां (ख) श्रमहराणां (ग) स्तम्भनीयानां (घ) बल्यानां
(757) .....पुष्टिकराणां।
(क) निर्वृतिः (ख) सर्वरसाभ्यासो (ग) कुक्कुटो (घ) व्यायाम
(758) वस्ति .....।
(क) वातहारणां (ख) व्याधिकराणां (ग) तंत्राणां (घ) अ एवं स दोनों
(759) .....सर्वापथ्यानाम् ।
(क) आविदुग्ध (ख) आयास (ग) विरू़़़़़़द्धाहार (घ) विषमासन
(760) छेदनीय, दीपनीय, अनुलोमन और वातकफ प्रशमन करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठ है।
(क) हींगुनिर्यास (ख) निःसंशयकराणां (ग) वैद्यसमूहानां (घ) साधनानां
(761) उदक् .....।
(क) आश्वासकराणां (ख) श्रमहराणां (ग) स्तम्भनीयानां (घ) बल्यानां
(762) 'वृष्य वातहराणाम्' है।
(क) एरण्ड पत्र (ख) एरण्ड मूल (ग) एरण्ड पंचांग (घ) उपर्युक्त सभी
(763) अन्नद्रव्य अरूचिकर भावों में श्रेष्ठ है।
(क) पराघातनम् (ख) तिन्दुक (ग) प्रमिताशन (घ) रजस्वलाभिगमन
(764) कुष्ठ .....।
(क) रोगाणाम् (ख) दीर्घरोगाणाम् (ग) रोगसमूहानाम् (घ) अनुषंगिणाम्
(765) चरक ने अग्रय प्रकरण में आमलकी को .....बताया है।
(क) वातहर (ख) दाहप्रशमन (ग) वयःस्थापन (घ) रसायन
(766) ‘निम्नलिखित में से कौन सी एक औषधि संग्रहणीय, दीपनीय और पाचनीय के रूप में नित्य सर्वाधिक उपयोगी है।
(क) मुस्ता (ख) कट्वंग (ग) शतुपुष्पा (घ) विल्ब
(767) कास, श्वास और हिक्का रोग में श्रेष्ठ औषधि कौन-सी है ?
(क) अनंतमूल (ख) पुष्करमूल (ग) दशमूल (घ) शटी
(768) चरक ने श्रेष्ठ बल्य बताया हैं।
(क) क्षीर (ख) बला (ग) घृत (घ) कुक्कुट
(769) एककाल भोजन .....।
(क) सुखपरिणाम कराणां (ख) कर्शनीयानाम् (ग) दौबर्ल्यकरणां (घ) अग्निसन्धुक्षणानां
(770) .....उद्धार्याणां।
(क) ग्रहणी (ख) आमदोष (ग) अजीर्ण (घ) आमविष
(771) .....विषघ्ननां।
(क) गोघृत (ख) शिरीष (ग) विडंग (घ) आमलकी
(772) श्रमघ्न द्रव्यों में श्रेष्ठ है
(क) सुरा (ख) क्षीर (ग) वस्ति (घ) सर्वरसाभ्यास
(773) आसव का सर्वप्रथम वर्णन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) आत्रेय (घ) वाग्भट्ट
(774) आसव का सर्वप्रथम परिभाषा दी है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) आत्रेय (घ) वाग्भट्ट
(775) आसव की योनियॉ है।
(क) 8 (ख) 9 (ग) 11 (घ) 6
(776) चरकानुसार आसव की संख्या है।
(क) 84 (ख) 90 (ग) 80 (घ) 9
(777) पुष्पासव की संख्या .....।
(क) 11 (ख) 10 (ग) 6 (घ) 4
(778) मूल आसव की संख्या .....।
(क) 11 (ख) 10 (ग) 84 (घ) 9
(779) चरकानुसार कितने प्रकार के त्वगासव है -
(क) 4 (ख) 11 (ग) 10 (घ) 26
(780) निम्न में से किसका त्वक् आसव नहीं होता है।
(क) तिल्वक (ख) लोध्र (ग) अर्जुन (घ) एलुआ
(781) निम्न में से किस द्रव्य का प्रयोग फल व सार दोनों आसवों मे होता है।
(क) खर्जूर (ख) धन्वन (ग) अर्जुन (घ) श्रृंगाटक
(782) 'पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम्' - किसने कहा है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) चक्रपाणि
(783) किसआचार्य ने पथ्य के साथ अपथ्य की भी परिभाषा दी है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) चक्रपाणि
(784) आसव नाम आसुत्वाद् आसवसंज्ञा। - किसने कहा है।
(क) चरक (ख) आत्रेय (ग) अग्निवेश (घ) चक्रपाणि
(785) आसुत्वात् सन्धानरूपत्वात् आसव। - किसने कहा है।
(क) चरक (ख) आत्रेय (ग) अग्निवेश (घ) चक्रपाणि
(786) यद पक्वकौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः। - किसने कहा है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) शारंर्ग्धर (घ) चक्रपाणि
(787) आसव और अरिष्ट में अन्तर सर्वप्रथम किसने बतलाया है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) शारंर्ग्धर (घ) चक्रपाणि
(788) चरक संहिता के किस अध्याय मे रस संख्या विनिश्चय संबंधी सम्भाषा परिषदहुई है।
(क) यज्जः पुरूषीयं (ख) आत्रेय भद्रकाप्यीय (ग) वातकलाकलीय (घ) अन्नपानविधि
(789) क्षारकी गणना रसों में किसने की है।
(क) वैदेह (ख) धामार्गव (ग) अ एवं ब दोनों (घ) उपर्युक्त कोई नही
(790) रस की संख्या 6 किसने मानी है।
(क) वार्योविद (ख) वाग्भट्ट (ग) पुर्नवसु आत्रेय (घ) उपर्युक्त सभी
(791) रस संख्या विषयक सम्भाषा परिषद में विदेह राज निमि ने कहा था रस होते है ?
(क) 5 (ख) 6 (ग) 7 (घ) 8
(792) ‘एक एव रस इत्युवाच’ - किसका कथन है।
(क) भद्रकाप्य (ख) शाकुन्तेय (ग) कुमारशिरा भरद्वाज (घ) हिरण्याक्ष
(793) छेदनीय, उपशमनीय और साधारण किसके भेद है ?
(क) रस (ख) दोष (ग) भेषज् (घ) आसव
(794) रस की संख्या 8 किसने मानी है ?
(क) वार्योविद (ख) निमि (ग) धामार्गव (घ) कांकांयन
(795) छेदनीय और उपशमनीय रसों को किसने माना है।
(क) कुमारशिराभारद्वाज (ख) हिरण्याक्ष मौद्गल्य पूर्णाक्ष (ग) शाकुन्तेय (घ) ब, स दानों
(796) किस आचार्य ने पंच महाभूतों के आधार पर रस 5 माने है।
(क) कुमारशिरा भारद्वाज (ख) हिरण्याक्ष (ग) शाकुन्तेय (घ) मौद्गल्य पूर्णाक्ष
(797) स पुनरूदकादनन्य। - रस को किसने माना है।
(क) भद्रकाप्य (ख) हिरण्याक्ष (ग) शाकुन्तेय (घ) मौद्गल्य पूर्णाक्ष
(798) रस की संख्या अपरिसंख्येयकिसने मानी है ?
(क) भद्रकाप्य (ख) वार्योविद (ग) कुमारशिरा भरद्वाज (घ) कांकायन
(799) रस की योनि हैं।
(क)जल (ख) रसेन्द्रिय (ग) द्रव्य (घ) कोई नहीं
(800) 'सर्व द्रव्यं पा×चभौतिकम अस्मिनर्न्थेः।'- किसने कहा है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(801) 'इह हि द्रव्यं प×चमहाभूतात्मकम्।'- किसनेकहा है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काश्यप
(802) कर्म पन्चविंधमुक्तं वमनादि-किसने कहाहै।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(803) आचार्य चरकानुसार ‘खर’ गुण कौनसे महाभूत में होता है।
(क) पृथ्वी (ख) वायु (ग) आकाश (घ) अ, ब दोनों
(804) आचार्य चरकानुसार ‘गुरू’ गुण कौनसे महाभूत में होता है।
(क) पृथ्वी (ख) जल (ग) पृथ्वी एवं जल (घ) कोई नहीं
(805) ‘आग्नेय द्रव्यों’ में ‘खर’ गुण किस आचार्य ने माना है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(806) ‘वायव्यद्रव्यों’ ‘व्यवायी, विकाशि’ गुण अतिरिक्तकिस आचार्य ने बतलाए है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(807) सुश्रुत एवं वाग्भट्ट के अनुसार ‘आकाशीयद्रव्यों’ का गुण नहींहै।
(क) लघु (ख) सूक्ष्म (ग) मृदु (घ) श्लक्षण
(808) 'नानौषधिभूतं जगति किन्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते' - संदर्भ मूलरूप से उद्धत है ?
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) भाव प्रकाश
(809) 'इत्थं च नानौषधभूतं जगति किं×चद द्रव्यमस्ति विविधार्थप्रयोगवशात्।' - संदर्भ मूलरूप से उद्धत है ?
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) भाव प्रकाश
(810) यदा कुर्वन्ति स .....।
(क) कर्म (ख) वीर्य (ग) कालः (घ) उपायः
(811) यथा कुर्वन्ति स .....।
(क) कर्म (ख) वीर्य (ग) कालः (घ) उपायः
(812) येनकुर्वन्ति तत् .....।
(क) कर्म (ख) वीर्य (ग) कालः (घ) उपायः
(813) यत्कुर्वन्ति तत् .....।
(क) कर्म (ख) वीर्य (ग) कालः (घ) उपायः
(814) रसों के संयोग भेद बतलाए गए है।
(क) 57 (ख) 67 (ग) 62 (घ) 63
(815) रसों के विकल्पभेद बतलाए गए है।
(क) 57 (ख) 67 (ग) 62 (घ) 63
(816) दो-दो, तीन-तीन, चार-चार, पॉच-पॉच एंव छः रस आपस में मिलकर क्रमशः द्रव्य बनाते है ?
(क) 15, 20, 15, 20, 25 (ख) 12, 18, 24, 30, 36 (ग) 30, 24, 18, 12, 6 (घ) 15, 20, 15, 6, 1
(817) रसों के संयोग व कल्पना भेदहै क्रमशः।
(क) 63, 57 (ख) 57, 63 (ग) 55, 62 (घ) 62, 57
(818) 3 रसों के संयोग से रस भेद।
(क) 15 (ख) 20 (ग) 6 (घ) 5
(819) शुष्क द्रव्य का जिहृवा से संयोग होने पर सर्वप्रथम अनुभूत होता है।
(क)रस (ख) अनुरस (ग) निपात (घ) विपाक
(820) रस का विपयर्य है।
(क) ऊषण (ख) अनुरस (ग) क्षार (घ) पटु
(821) ‘रसो नास्तीह सप्तमः’ - किस आचार्य का कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) विदैह निमि (घ)शारंर्ग्धर
(822) चरक संहिता के किस अध्याय मेंपरादि गुणों एवंउनके लक्षणों का निर्देश है।
(क) यज्जः पुरूषीय (ख) आत्रेय भद्रकाप्यीय (ग) इन्द्रियोपक्रमणीय (घ) अन्नपानविधि
(823) ‘चिकित्सीय सिद्धि के उपाय’ हैं।
(क) इन्द्रिय गुण (ख) गुर्वादि गुण (ग) परादि गुण (घ) आत्म गुण
(824) ‘चिकित्सीय गुण’ हैं।
(क) इन्द्रिय गुण (ख) गुर्वादि गुण (ग) परादि गुण (घ) आत्म गुण
(825) चरकानुसार संयोग, विभागएंव पृथकत्व के क्रमशः भेद है -
(क) 3, 3, 2 (ख) 3, 3, 4 (ग) 3, 3, 3 (घ) 3, 2, 3
(826) ‘वियोग’किसका भेद है।
(क) संयोग (ख) विभाग (ग) पृथकत्व (घ) परिमाण
(827) ‘वैलक्षण्य’किसका भेद है।
(क) संयोग (ख) विभाग (ग) पृथकत्व (घ) परिमाण
(828) शीलन किसका पर्याय है।
(क) संयोग (ख) विभाग (ग) संस्कार (घ) अभ्यास
(829) परादि गुणों की संख्या 7 किसने मानी है।
(क) न्याय दर्शन (ख) वैशेषिकदर्शन (ग) सांख्यदर्शन (घ) योगदर्शन
(830) कणाद ने परादि गुणों में किसकी गणना नहीं कीहै।
(क) युक्ति (ख) अभ्यास (ग) संस्कार (घ) उपर्युक्त सभी
(831) 'पवनपृथ्वी व्यतिरेकात्’ से किस रस का निर्माण होताहैं ? (च.सू.26/40)
(क) अम्ल (ख) लवण (ग) मधुर (घ) कषाय
(832) लवण रस का भौतिक संगठन है।
(क) पृथ्वी + जल (ख) जल + अग्नि (ग) पृथ्वी + अग्नि (घ) वायु + पृथ्वी
(833) गुरू, स्निग्ध व उष्ण गुण किस रस में उपस्थित होते है ?
(क) कटु (ख)तिक्त (ग) लवण (घ) अम्ल
(834) ’मनो बोधयति’ कौनसा रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कषाय
(835) ’क्रिमीन् हिनस्ति’ किस रस का कर्म है।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(836) ’आहार योगी’ रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कटु।
(837) ’हदयं तर्पयति’ रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कटु
(838) ’हदयं पीडयति’ किस रस के अतिसेवन के कारणहोताहै।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(839) ’शोणितसंघात भिनत्ति’ रस है।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(840) ’विषघ्न’ रस है।
(क) लवण (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(841) ’विषं वर्धयति’ किस रस के अतिसेवन के कारणहोता है।
(क) लवण (ख) कटु (ग) तिक्त (घ)कषाय
(842) ’पुंस्त्वमुपहन्ति’ किस रस के अतिसेवन के कारण होता है।
(क) कटु (ख) लवण (ग)कषाय (घ) उपर्युक्त सभी
(843) ’रक्त दूषयति’ किस रस के अतिसेवन के कारण होताहै।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(844) ’गलगण्ड और गण्डमाला रोग’ किस रस के अतिसेवन के कारण होता है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कषाय
(845) ’स्तन्यशोधन’ किस रस का कार्यहै।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(846) ’ज्वरघ्न’ किस रस का कार्यहै।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(847) ’संशमन’ किस रस का कार्यहै।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(848) तिक्तरस का कार्य है।
(क) विषघ्न (ख) कृमिघ्न (ग) ज्वरघ्न (घ) उपर्युक्त सभी
(849) कषायरस का कार्य है।
(क) शोषण (ख) रोपण (ग) पीडन (घ) उपर्युक्त सभी
(850) मधुररस का कार्य है।
(क) प्रीणन (ख) जीवन (ग) तर्पण (घ) उपर्युक्त सभी
(851) ’लेखन’ किस रस का कार्यहै।
(क) लवण (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(852) ’सर्वरसप्रत्यनीक भूतः’ रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कटु
(853) ’भक्तं रोचयति’ रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कटु
(854) ’रोचयत्याहारम्’ रस है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) लवण (घ) कटु
(855) दीपन, पाचन कर्म किस रस का कर्म है।
(क) मधुर, अम्ल (ख) अम्ल, लवण (ग) कटु, लवण (घ)तिक्त, लवण
(856) ‘ऊर्जयति’ किस रस का कर्म है।
(क) अम्ल (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(857) ‘रूक्षः शीतोऽलघुश्च’ गुण किस रस में उपस्थित होते है ?
(क) अम्ल (ख) मधुर (ग) लवण (घ) कषाय
(858) ‘लघु, उष्ण, स्निग्ध’ गुण किस रस में उपस्थित होते है ?
(क) अम्ल (ख) मधुर (ग) लवण (घ) कषाय
(859) चरक ने मध्यमगुरू किस रस को माना है।
(क) अम्ल (ख) लवण (ग) कषाय (घ) मधुर
(860) चरक ने उत्तम लघु किस रस को माना है।
(क) अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(861) चरक ने उत्तम उष्ण किस रस को माना है।
(क) अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(862) चरक ने अवर रूक्ष किस रस को माना है।
(क) अम्ल (ख) लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(863) चरक ने अवर स्निग्ध किस रस को माना है।
(क) अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(864) चरक ने लवणरस का विपाक माना है।
(क) मधुर विपाक (ख) अम्लविपाक (ग) कटु विपाक (घ) कोई नहीं
(865) पित्तवर्धक, शुक्रनाश, सृष्टविडमूत्रल - कौनसे विपाक के गुणधर्म है।
(क) मधुरविपाक (ख) अम्लविपाक (ग) कटु विपाक (घ) उपर्युक्त सभी
(866) कौनसा विपाक ‘सृष्टविडमूत्रल’ होताहै।
(क) मधुर विपाक (ख) अम्लविपाक (ग) कटु विपाक (घ) अ, ब दोनों
(867) चरक मतानुसार कौनसा विपाक ‘शु्क्रलः’ होताहै।
(क) मधुर विपाक (ख) अम्लविपाक (ग) कटु विपाक (घ) अ, ब दोनों
(868) 'विपाकः कर्मनिष्ठया' - किसका कथन है।
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(869) चरकने वीर्य के भेद माने है।
(क) 2 (ख) 15 (ग) 8 (घ) अ, स दोनों
(870) सुश्रुत ने वीर्य का कौनसा भेद नहीं माना है ?
(क) गुरू, लघु (ख) विशद, पिच्छिल (ग) स्निग्ध, रूक्ष, (घ) मदु, तीक्ष्ण
(871) वीर्य का ज्ञान होता है।
(क) निपात (ख) अधिवास (ग) दोनोंसे (घ) कर्मनिष्ठासे
(872) ’विदाहच्चास्य कण्ठस्य’ किस रस का लक्षण है।
(क) अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(873) ’स विदाहान्मुखस्य च’ किस रस का लक्षण है।
(क) अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(874) ’विदहन्मुखनासाक्षिसंस्रावी’ किस रस का लक्षण है।
(क)अम्ल (ख)लवण (ग) कटु (घ) तिक्त
(875) ’वैशद्यस्तम्भजाडयैर्यो रसनं’ किस रस का लक्षण है।
(क) लवण (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(876) मरिच की तीक्ष्णता का ज्ञान होता है।
(क) निपात (ख) अधिवास (ग) दोनोंसे (घ) कर्मनिष्ठासे
(877) रसवीर्य विपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते। विशेषः कर्मणां चैव .....तस्य स स्मृतः।।
(क) पाचनः (ख) दीपनः (ग) प्रभावः (घ) वीर्यसंक्रान्ति
(878) ‘रसादि साम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम्।‘- किसका कथन है ?
(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) वाग्भट्ट
(879) चरकानुसार निम्न में से किसका नैसर्गिक बल सर्वाधिक है।
(क) रस (ख) विपाक (ग) वीर्य (घ) प्रभाव
(880) चरक ने वैरोधिक आहार केकितने घटक बताए हैं।
(क) 15 (ख) 18 (ग) 12 (घ) 5
(881) अम्ल पदार्थों के साथ दूध पीना हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) वीर्य विरूद्ध (ग) विधि विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(882) एरण्ड की लकड़ी की सींक पर भुना हुआ मोर का मांस हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) परिहार विरूद्ध (ग) उपचार विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(883) वाराह आदि का मांस सेवन कर फिर उष्ण वस्तुओं का सेवन करना हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) परिहार विरूद्ध (ग) उपचार विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(884) घृत आदि स्नेहों को पीकर शीतल आहार-औषध या जल पीना हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) परिहार विरूद्ध (ग) उपचार विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(885) गुड के साथ मकोय खाना हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) परिहार विरूद्ध (ग) उपचार विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(886) श्रम, व्यवाय, व्यायाम आदि में आसक्त व्यक्ति द्वारा वातवर्धक आहार का सेवन हैं।
(क) कर्म विरूद्ध (ख) प्रकृति विरूद्ध (ग) विधि विरूद्ध (घ) अवस्था विरूद्ध
(887) चरक ने दूध के साथ किसका निषेध नहीं बतलाया है।
(क) मूली (ख) मत्स्य (ग) सहिजन (घ) सूकर मांस
(888) सभी मछलियों को दूध के साथ खाना चाहिए किन्तु चिलिचिम मछली को छोडकर - किसका मत है।
(क) आत्रेय (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) भद्रकाप्य
(889) मछलियों को दूध के साथ खाना हैं।
(क) संयोग विरूद्ध (ख) वीर्य विरूद्ध (ग) विधि विरूद्ध (घ) संस्कार विरूद्ध
(890) चरकोक्त 'अर्जक, सुमुख और सुरसा' किसके भेद है ?
(क) तुलसी (ख) त्रिवृत्त (ग) शतावरी (घ) दूर्वा
(891) 'तुलसी' शब्द सर्वप्रथममूलरूप से किस ग्रन्थ में उद्धत है ?
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत सिंहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) भाव प्रकाश
(892) सीधु .....।
(क) जर्जरीकरोति (ख) वधमति (ग) ग्लयपति (घ)माचिनोति
(893) मधु.....।
(क) सन्दधीति (ख) पाचयति (ग) ग्लयपति (घ) स्नेहयति
(894) प्रायः सभी तिक्तद्रव्य वातल और वृष्य होते है .....को छोडकर।
(क) निम्ब (ख) पटोलपत्र (ग) पिप्पली (घ) बृहती
(895) शोफं जनयति ?
(क) पयः (ख) घृत (ग) दधि (घ) तक्र
(896) प्रायः सभी कटु द्रव्य वातल और अवृष्य होते है .....को छोडकर।
(क) चित्रक, मरिच (ख) वेताग्र, पटोलपत्र (ग) पिप्पली, शुण्ठी (घ) दाडिम
(897) द्राक्षासव ..... ।
(क) दीपयति (ख) पाचयति (ग) बृंहयति (घ) कर्षयति
(898) क्षार का स्वभाविक कर्म है।
(क) पाचन (ख) दहन (ग) क्षारण (घ) ग्लपयन
(899) निम्न में से कौन मधुर रस वाला होने पर भी कफवर्धक नहींहै।
(क) द्राक्षा (ख) मधु (ग) एरण्ड (घ) परूषक
(900) चरकने आहार द्रव्यों के कितने वर्ग बताये है।
(क) 12 (ख) 7 (ग) 6 (घ) 10
(901) सुश्रुतने आहार द्रव्यों के कितने महावर्ग बताये है।
(क) 2 (ख) 7 (ग) 5 (घ) 3
(902) ’चरक संहिता’ में मधु का वर्णन कौनसे वर्ग में मिलता है।
(क) मधु वर्ग (ख) इक्षु वर्ग (ग) कृतान्न वर्ग (घ) आहारयोगीवर्ग
(903) 'वैदल वर्ग' का वर्णन कौनसे ग्रन्थ में है।
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) भाव प्रकाश
(904) 'सर्वानुपान वर्ग' का वर्णन कौनसे ग्रन्थ में है।
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) अष्टांग हृदय
(905) 'हरित वर्ग' का वर्णन कौनसे ग्रन्थ में है।
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) अष्टांग हृदय
(906) 'औषध वर्ग' का वर्णन कौनसे ग्रन्थ में है।
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) अष्टांग हृदय
(907) 'मूत्र वर्ग' का वर्णन कौनसे ग्रन्थ में ंनही है।
(क) चरक संहिता (ख) सुश्रुत संहता (ग) अष्टांग संग्रह (घ) अष्टांग हृदय
(908)'बहुवातशकृत कारक' धान्यहै।
(क) गोधूम (ख) यव (ग) गवेधूक (घ) षष्टिक धान्य
(909) ‘वातहर’ शिम्बी धान्य है ?
(क) कलाय (ख) माष (ग) राजमाष (घ) अरहर
(910) ‘ज्वर और रक्तपित्त’ में प्रशस्तधान्य है ?
(क) मूद्ग (ख) माष (ग) मोठ (घ) मसूर
(911) चरकमतानुसार कास, हिक्का, श्वास और अर्श के लिए हितकर द्रव्यहै।
(क) कुलत्थ (ख) काकाण्डोल (ग) श्यामाक (घ) उडद
(912) आचार्य चरक ने मांसवर्ग में कितने प्रकार की योनियॉ बतलाई है।
(क) 2 (ख) 6 (ग) 5 (घ) 8
(913) आचार्य चरक ने ‘चरणायुधा या कुक्कुट’ को कौनसे योनि वाले मांसवर्ग में रखाहै।
(क) प्रसह (ख) प्रदुत (ग) जांगल (घ) विष्किर
(913) आचार्य चरक ने ‘गवय या नीलगाय’ को कौनसे योनि वाले मांसवर्ग में रखाहै।
(क) प्रसह (ख) आनूप (ग) जांगल (घ) भूशय
(914) चरक ने शुक्ति और श्ांखक का वर्णन किस वर्ग में कियाहै।
(क) सुधा वर्ग (ख) सिकता वर्ग (ग) कृतान्न वर्ग (घ) मांसवर्ग
(915) आचार्य चरक ने ‘कपोत और पारावत’ को कौनसे योनि वाले मांसवर्ग में रखाहै।
(क) प्रसह (ख) प्रदुत (ग) जांगल (घ) विष्किर
(916) निम्न में से किस मांसवर्ग का मांस ’लघु’ नहीं होता है।
(क) प्रसह (ख) प्रदुत (ग) जांगल (घ) विष्किर
(917) निम्न में से किसका मासं ‘बृंहण’ होता है।
(क) अजमांस (ख) चरणायुधा (ग) मत्स्य (घ) उपर्युक्त सभी
(918) निम्न में से किसका मासं ‘मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोषघ्न’ होता है।
(क) ऐण मांस (ख) मयूर मांस (ग) कपोत मांस (घ) कूर्म मांस
(919) शरीरबंहणे नान्यत् खाद्यं मांसाद्विशिष्यते - किस आचार्य का कथन है।
(क)चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) भाव प्रकाश
(920) सक्षारं पक्वकूष्माण्डं मधुराम्लं तथा लघु। सृष्टमूत्रपुरीष च.....। (च.सू.27/113)
(क) सर्वदोषनिवर्हणम् (ख) वातकफहरं (ग) त्रिदोषघ्नः (घ) वातपहा
(921) चरक ने फलवर्ग का आरम्भ किससे किया है।
(क) खर्जूर (ख) मृद्विका (ग) द्राक्षा (घ) दाडिम
(922) सुश्रुत ने फलवर्ग का आरम्भ किससे किया है।
(क) खर्जूर (ख) मृद्विका (ग) द्राक्षा (घ) दाडिम
(923) चरकमतानुसार ‘टंक’ किसका पर्याय है।
(क) नाशपाती (ख) सेव (ग) फल्गु (घ) केला
(924) चरकमतानुसार ‘मोचा’ किसका पर्याय है।
(क) नाशपाती (ख) सेव (ग) फल्गु (घ) केला
(925) कच्चा बिल्व होता है।
(क) उष्णवीर्य (ख) कफवातजितम् (ग) दीपन (घ) उपर्युक्त सभी
(926) रसासृङमांसमेदोविकार नाशकहै।
(क) गुड (ख) हरीतकी (ग)विभीतक (घ) आमलकी
(927) चरकमतानुसार ‘लवलीफल’ होता है।
(क) वातलं (ख) कफवातघ्नः (ग) कफपित्तहर (घ) त्रिदोषघ्नं
(928) ‘सर्वान् रसान्लवणवर्जितान्’ किसके लिए कहा गयाहै।
(क) आमलक (ख) हरीतकी (ग) रसोन (घ) उपर्युक्त सभी
(929) चरकमतानुसार ‘विश्वभेषज’ किसका पर्याय है।
(क) आर्द्रक (ख) हरीतकी (ग) रसोन (घ) गुडूची
(930) क्रिमिकुष्ठकिलासघ्नो वातघ्नो गुल्मनाशनः - किसके संदर्भ में कहा गया है।
(क) आरग्वध (ख) यवक्षार (ग) लशुन (घ) पलाण्डु
(931) तीक्ष्ण मद्यहै।
(क) सुरा (ख) सीधु (ग) सौवीरक (घ) सुरासव
(932) सात्विक विधि से मद्यपान का वर्णन किस आचार्य ने किया है।
(क)चरक (ख) सुश्रुत (ग) काश्यप (घ) भाव प्रकाश
(933) ‘मधूलिका’ होती है।
(क) कफशामक (ख) कफवर्धक (ग) कफघ्न (घ) उपर्युक्तसभी।
(934) चरकोक्त अंतरिक्ष जल के गुण है।
(क) 15 (ख) 9 (ग) 6 (घ) 5
(935) अंतरिक्ष जल के ’पाण्डुर भूमि’ पर गिरने पर किस रस की उत्पत्ति होगी।
(क) मधुर (ख) लवण (ग) तिक्त (घ) कषाय
(936) अंतरिक्ष जल के ’कपिल भूमि’ पर गिरने परकिस रस की उत्पत्ति होगी।
(क) अम्ल (ख) लवण (ग) तिक्त (घ) क्षार
(937) कौनसी ऋतु में बरसने वाला जल ‘कषाय मधुररस और रूक्ष गुण’वाला होता है।
(क) हेमन्त (ख) बसन्त (ग) ग्रीष्म (घ) बर्षा
(938) ’पथ्यास्ता निर्मलोदकाः।’ - यह गुण कौनसी नदियों के जल में मिलता है।
(क) हिमवत्प्रभवाः (ख) मलयप्रभवाः (ग) पूर्वसमुद्रगा (घ) पश्चिमाभिमुखाः
(939) चरकानुसार शिरोरोग, हृदयरोग, कुष्ठ, श्लीपदजनक। - यह गुण कौनसी नदियों के जल में मिलता है।
(क) पारियात्रप्रभवाः (ख) सह्यप्रभवाः (ग) विन्ध्यप्रभवा (घ) उपर्युक्त सभी
(940) निम्नलिखित त्रिदोषक प्रकोपक नहीं है।
(क) कुसुम्भ तैल (ख) सामुद्र जल (ग) प्रज्ञापराध (घ) मिथ्या आहार विहार
(941) चरकोक्त गोदुग्ध के गुण है।
(क) 15 (ख) 9 (ग) 6 (घ) 10
(942) प्रवरं जीवनीयानाम् .....उक्तंरसायनम्।(च.सू.27/218)
(क) क्षीर (ख) सर्पि (ग) मधु (घ) शिवा
(943) चरकानुसार किसका दुग्ध ‘शाखा वातहरं’ होता है।
(क) हस्ति (ख) उष्ट्र (ग) माहिषी (घ) एकशफ
(944) जीवनं वृहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः। नावनं .....च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम्।।
(क) पीनसे (ख) रक्तपित्ते (ग) शिरशूले (घ) अर्दिते
(945) चरकानुसार अत्यग्नि नाशक है।
(क) गोमांस (ख) माहिषीदुग्ध (ग) आविमांस (घ) अ, ब दोनों
(946) त्रिदोषक प्रकोपक होता है।
(क) मन्दक (ख) पीयूष (ग) मोरट (घ) किलाट
(947) चरकमतानुसार ‘योनिकर्णशिरःशूल नाशक’ घृत है।
(क) पुराण घृत (ख) प्रपुराण (ग) जीर्णघृत (घ) कौम्भघृत
(948) प्रभूतक्रिमिमज्जासृड्मेदोमांसकरो है।
(क) गुड (ख) हरीतकी (ग) विभीतक (घ) आमलकी
(949) ’घृत वर्ण’ का मधु किससे प्राप्त होता है।
(क) माक्षिक (ख) क्षौद्र (ग) भ्रामर (घ) पौत्तिक
(950) ’कपिल वर्ण’ मधु होता है।
(क) माक्षिक (ख) क्षौद्र (ग) भ्रामर (घ) पौत्तिक
(951) मधु का रस होता है।
(क) मधुर (ख) कषाय (ग) मधुर, कषाय (घ) मधुर, लवण
(952) चरक ने किसे योगवाहि नहीं कहा है।
(क) पिप्पली (ख) मधु (ग) घृत (घ) वायु
(953) नातः कष्टतमं किंचित .....त्तद्धि मानवम्। उपक्रम विरोधित्वात् सद्योहन्याद्यथाविषम्। - किसके संदर्भ में कहा है।
(क) दूषी विष (ख) मूढगर्भ (ग) अजीर्ण (घ) मध्वाम
(954) कौनसी जाति कामधु ‘गुरू’होता है।
(क) माक्षिक (ख) क्षौद्र (ग) भ्रामर (घ) पौत्तिक
(955) निम्नलिखित कौनसी अन्न कल्पना ’ग्राहि’ है।
(क) पेया (ख)विलेपी (ग) मण्ड (घ) वेशवार
(956) वाग्भट्टानुसार निम्नलिखित कौनसी अन्न कल्पना ’सबसे लघुतम’ है।
(क) पेया (ख)विलेपी (ग) मण्ड (घ) यवागू
(957) निम्नलिखित कौनसी अन्न कल्पना ‘प्राणधारण’ है।
(क)पेया (ख)विलेपी (ग) मण्ड (घ) वेशवार
(958) निम्नलिखित कौनसी अन्न कल्पना ‘दाहमूर्च्छानिवारण’ है।
(क) लाजपेया (ख)वेशवार (ग) मण्ड (घ) लाजमण्ड
(959) चरक ने ‘रागषाडव’ का वर्णन किस वर्ग में किया है।
(क) हरित वर्ग (ख) कृतान्न वर्ग (ग) आहारयोनि वर्ग (घ) कोई नहीं
(960) ..... संयोगसंस्करात् सर्वरोगापहं मतम्।- चरक ने किसके संदर्भ में कहा है।
(क) तैलं (ख) घृत (ग) पयः (घ) लवणं
(961) निम्नलिखित में से कौनसा तैल ‘सर्वदोषप्रकोपण’है।
(क) कुसुम्भ तैल (ख) सर्षप तैल (ग) एरण्ड तैल (घ) तिल तैल
(962) सभी तैलों का अनुरस होता है।
(क) मधुर (ख) लवण (ग) तिक्त (घ) कषाय
(963) चरक के मत से शुण्ठीका विपाक होता है।
(क) मधुर (ख) अम्ल (ग) कटु (घ) उपरोक्त कोई नहीं
(964) आर्द्र पिप्पली का रस होता है।
(क) मधुर (ख) कटु (ग) तिक्त (घ) कषाय
(965) कौनसी पिप्पली ‘बृष्य’ होती है।
(क) आर्द्र (ख) शुष्क (ग) दोनों (घ) उपरोक्त कोई नहीं
(966) कौनसा लवण शीत वीर्य होता है।
(क) सैन्धव (ख) सामुद्र (ग) सौर्वचल (घ) विड
(967) रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यं अविदाहि। त्रिदोषघ्न, समधुर। - कौंनसा लवण होता है।
(क) सैन्घव (ख) सामुद्र (ग) सौर्वचल (घ) विड
(968) उर्ध्व चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं लवण है।
(क) विड (ख) सामुद्र (ग) सौर्वचल (घ) औद्भिद्
(969) कौनसा क्षार अर्शनाशक होता है।
(क) यवक्षार (ख) सज्जीक्षार (ग) टंकण (घ) उपर्युक्त सभी
(970) चरक ने अन्नपान परीक्षणीय विषय बताएॅ है।
(क) 8 (ख) 9 (ग) 6 (घ) 10
(971) कौनसे शरीरायव का मांस सर्वाधिक गुरू होताहै।
(क) सक्थि (ख) स्कन्ध (ग) क्रोड (घ) शिर
(972) कौनसे शरीरायव का मांस सर्वाधिक गुरू होताहै।
(क) वृषण (ख) वृक्क (ग) यकृत (घ) मध्य देह
(973) भोज्य, भक्ष्य, चर्व्य, लेह्य, चोष्ट और पेय - आहार के 6 भेद किसने माने है।
(क) चरक, सुश्रुत (ख) भाव प्रकाश, शार्रग्धर (ग) चरक, वाग्भट्ट (घ) काश्यप, शार्रग्धर
(974) ’गुल्म’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) रस प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) मांस प्रदोषज (घ) मज्जा प्रदोषज
(975) ’ग्रन्थि’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) रस प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) मांस प्रदोषज (घ) उपधातुप्रदोषज
(976) ’मूर्च्छा’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) रस प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) मांस प्रदोषज (घ) मज्जा प्रदोषज
(977) ’अलजी’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) मेद प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) मांस प्रदोषज (घ) मज्जा प्रदोषज
(978) ’क्लैव्य’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) रस प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) शु्क्र प्रदोषज (घ) रस, शु्क्र प्रदोषज
(979) ’पाण्डुत्व’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) रस प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) मांस प्रदोषज (घ) मज्जा प्रदोषज
(980) ’गर्भपात व गर्भस्राव’ कौनसा धातु प्रदोषज विकार है।
(क) आर्तव प्रदोषज (ख) रक्त प्रदोषज (ग) शु्क्र प्रदोषज (घ) शु्क्रार्तव प्रदोषज
(981) रस धातुप्रदोषज विकारों की चिकित्सा है।
(क) लंघन (ख) लंघन पाचन (ग) दोषावसेचन (घ) उर्पयुक्त सभी
(982) ’पंचकर्माणि भेषजम्’ किस धातुप्रदोषज विकार की चिकित्सा में निर्देशित है।
(क) मांस (ख) मेद (ग) अस्थि (घ) मज्जा
(983) व्यवाय, व्यायाम, यथाकाल संशोधन। - किस धातुप्रदोषज विकार की चिकित्सा में निर्देशित है।
(क) अस्थि (ख) मज्जा (ग) शु्क्र प्रदोषज (घ) मज्जा, शु्क्र प्रदोषज
(984) ’संशोधन, शस्त्र, अग्नि, क्षारकर्म।’ - किस धातुप्रदोषज विकार की चिकित्सा में निर्देशित हैं।
(क) मांस प्रदोषज (ख) मेद प्रदोषज (ग) अस्थि प्रदोषज (घ) उपधातु प्रदोषज
(985) चरक ने दोषों के कोष्ठ से शाखा में गमन के कितने कारण बताए है।
(क) 3 (ख) 4 (ग) 5 (घ) इनमें से कोई नहीं
(986) चरक ने दोषों के शाखा से कोष्ठ में गमन का कौनसा कारण नहीं बताया है।
(क) वृद्धि (ख) विष्यन्दन (ग) व्यायाम (घ) वायुनिग्रह
(987) श्रुत बुद्धिः स्मृतिः दाक्ष्यं धृतिः हितनिषेवणम्। - किसके गुण है ?
(क) आचार्य के (ख) शिष्य के (ग) परीक्षक के (घ) प्राणाभिसर के
(988) चरकोक्त दश प्राणायतन में शामिल नहीं है।
(क) हृदय (ख) वस्ति (ग) कण्ठ (घ) फुफ्फुस
(989) चरकमतानुसार ‘कुलीन’ किसकागुण है ?
(क) प्राणाभिसर वैद्य का (ख) धात्री का (ग) परीक्षक का (घ) रोगाभिसर वैद्य का
(990) ‘अर्थ’किसका पर्यायहै।
(क) हृदय (ख) मन (ग) आत्मा (घ) धन
(991) 'आगारकर्णिका'की तुलना किससे की गयी है।
(क) हृदय (ख) मन (ग) आत्मा (घ) प्राणायतन
(992) ..... हर्षणानां।
(क) तत्वावबोधो (ख) इन्द्रियजयो (ग) विद्या (घ) अंहिसा
(993) ‘चेतनानुवृत्ति’किसका पर्यायहै।
(क) हृदय (ख) मन (ग) आत्मा (घ) आयु
(994) हित आयु एवं अहित आयु के लक्षण, सुखायु एवं दुःखायु के लक्षणों का विस्तृत वर्णन कहॉ मिलता है ?
(क) चरक सूत्रस्थान1 (ख) चरक सूत्रस्थान30 (ग) चरक इन्द्रियस्थान (घ) चरक शारीरस्थान
(995) निरोध किसका पर्याय है।
(क) मोक्ष (ख) मृत्यु (ग) आत्मा (घ) मन
(996) आयुर्वेद के नित्य या शाश्वत होने का कारण है।
(क) अनादित्वात् (ख) स्वभावसंसिद्ध लक्षणत्वात् (ग) भावस्वभाव नित्यात्व (घ) उर्पयुक्त सभी
(997) चरक ने एक वैद्य को दूसरे वैद्य की परीक्षा करने के लिए कितने प्रश्न पूछने का निर्देश दिया है।
(क) 8 (ख) 9 (ग) 15 (घ) 18
(998) वैद्य परीक्षा विषयक प्रश्न नहीं है।
(क) तंत्र (ख) स्थान (ग) सूत्र (घ) ज्ञान
(999) ’आश्रय स्थान’ कहा जाता है।
(क) सूत्र स्थान (ख) शारीर स्थान (ग) कल्प स्थान (घ) चिकित्सा स्थान
(1000) आयुर्वेद तंत्र का 'शुभ शिर' है।
(क) सूत्र स्थान (ख) शारीर स्थान (ग) कल्प स्थान (घ) चिकित्सा स्थान
उत्तरमाला
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701. क |
721. घ |
741. घ |
761. क |
781. ख |
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702. क |
722. ग |
742. ख |
762. ख |
782. क |
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703. क |
723. ग |
743. ख |
763. क |
783. क |
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704. क |
724. घ |
744. ग |
764. ख |
784. क |
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705. ख |
725. ग |
745. घ |
765. ग |
785. घ |
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706. क |
726. ख |
746. ग |
766. क |
786. ग |
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707. घ |
727. ग |
747. ख |
767. ख |
787. ग |
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708. क |
728. घ |
748. ग |
768. घ |
788. ख |
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709. घ |
729. ग |
749. ग |
769. क |
789. ग |
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710. ख |
730. घ |
750. घ |
770. ग |
790. घ |
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711. घ |
731. घ |
751. ग |
771. ख |
791. ग |
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712. ख |
732. घ |
752. ग |
772. क |
792. क |
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713. ग |
733. ख |
753. घ |
773. क |
793. क |
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714. ख |
734. ख |
754. ग |
774. क |
794. ग |
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715. ख |
735. ख |
755. ख |
775. ख |
795. घ |
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716. घ |
736. ग |
756. ग |
776. क |
796. क |
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717. ख |
737. घ |
757. क |
777. ख |
797. क |
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718. ख |
738. घ |
758. घ |
778. क |
798. घ |
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719. घ |
739. ख |
759. ख |
779. क |
799. क |
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720. ख |
740. ख |
760. क |
780. ग |
800. क |
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801. ग |
821. क |
841. क |
861. ख |
881. क |
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802. क |
822. ख |
842. घ |
862. घ |
882. घ |
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803. घ |
823. ग |
843. क |
863. ख |
883. ख |
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804. क |
824. ख |
844. क |
864. क |
884. ग |
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805. ख |
825. ग |
845. ग |
865. ख |
885. क |
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806. ग |
826. ख |
846. ग |
866. ख |
886. घ |
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807. क |
827. ग |
847. घ |
867. ख |
887. घ |
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808. क |
828. घ |
848. घ |
868. क |
888. घ |
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809. ग |
829. ख |
849. घ |
869. घ |
889. ख |
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810. ग |
830. घ |
850. घ |
870. क |
890. क |
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811. घ |
831. घ |
851. ग |
871. ग |
891. ग |
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812. ख |
832. ख |
852. ग |
872. क |
892. ख |
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813. क |
833. ग |
853. ख |
873. ख |
893. क |
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814. क |
834. ख |
854. ग |
874. ग |
894. ख |
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815. घ |
835. ख |
855. घ |
875. घ |
895. ग |
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816. घ |
836. ग |
856. क |
876. ग |
896. ग |
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817. ख |
837. ख |
857. घ |
877. ग |
897. क |
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818. ख |
838. घ |
858. क |
878. घ |
898. घ |
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819. क |
839. ख |
859. ग |
879. घ |
899. ख |
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820. ख |
840. ग |
860. घ |
880. ख |
900. क |
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901. क |
921. ख |
941. घ |
961. क |
981. क |
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902. ख |
922. घ |
942. क |
962. ख |
982. ग |
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903. ख |
923. क |
943. घ |
963. क |
983. घ |
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904. क |
924. घ |
944. ख |
964. क |
984. क |
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905. ग |
925. ख |
945. घ |
965. ख |
985. ख |
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906. घ |
926. ग |
946. क |
966. क |
986. ग |
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907. घ |
927. क |
947. ग |
967. क |
987. ग |
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908. ख |
928. क |
948. क |
968. क |
988. घ |
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909. ख |
929. क |
949. घ |
969. क |
989. क |
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910. ग |
930. ग |
950. ख |
970. ख |
990. क |
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911. क |
931. घ |
951. ग |
971. घ |
991. क |
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912. घ |
932. क |
952. ग |
972. घ |
992. क |
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913. ख |
933. ख |
953. घ |
973. ख |
993. घ |
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914. घ |
934. ग |
954. ग |
974. ख |
994. ख |
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915. ख |
935. ग |
955. ख |
975. घ |
995. ख |
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916. क |
936. घ |
956. ग |
976. घ |
996. घ |
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917. घ |
937. ख |
957. ग |
977. ग |
997. क |
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918. घ |
938. घ |
958. घ |
978. घ |
998. घ |
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919. क |
939. घ |
959. ग |
979. क |
999. ख |
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920. क |
940. घ |
960. क |
980. ग |
1000. क |
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